जब तक जिया मैं,
जिया ऐशो-आराम से ।
मैं लूटता रहा गरीबों को,
चूसता रहा लाचारों को,
ताकि भर सके मेरी तिज़ोरी ।
मैं जलता रहा औरों की तरक्की पर,
और करता रहा जोड़-तोड़ ,
ताकि निकल सकूँ सबसे आगे ।
मैंने कभी देखा नहीं,
किसी नारी को पवित्र दृष्टि से ।
और जब भी मौका मिला ,
इस्तेमाल किया उन्हें,
अपने ताकत-दौलत के बल पर,
अपनी वासना की आग बुझाने को ।
हाँ, मैंने वो सब कुछ हासिल किया,
जो मैंने चाहा- ‘सही या गलत’ ।
ज़िन्दगी आराम से कट रही थी,
कि अचानक एक रोज,
मार दिया गया मुझे,
धर्म-सम्प्रदाय के दंगों में ।
अब सोचता हूँ मैं मरा-मरा -
कि क्यों व्यर्थ झगड़ता रहा मैं ईश्वर से
मानव-जन्म के लिए ?
जब ऐसे ही जीनी थी ज़िन्दगी,
तो क्यों-ना पैदा हुआ मैं,
कुत्ते के रूप में ?
यों कम-से-कम मैं बैमोत मरता तो नहीं,
इस धर्म-सम्प्रदाय के झगड़े में ।
यों कम-से-कम ज़िन्दगी लम्बी तो होती ।
- राजेश 'आर्य' [ rajesh010439@gmail.com ]
ज़िन्दगी
Comments :
| Sri Prakash wrote... |
| Nice !! |
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