मातृ दिवस पर
मुश्किलें तो आएँगी,
ख्वाब तो टूटेंगे ।
किस्मत तो रूठेगी,
धैर्य तो छूटेगा ।
जब लक्ष्य अचानक छूट जाएगा,
हाथों तक आते-आते ।
जब आँसू भी छोड़ना चाहेंगे,
साथ आँखों का ।
जब सांत्वना भरे शब्द,
तब्दील हो जाएँगे, फ़ब्तियों में ।
जब कोई तर्क इसका उत्तर नहीं दे पाएगी,
कि ये आखिर क्यों हुआ ?
जब आत्मा भी बागी हो जाएगी
और शत्रु मन के साथ मिलकर,
तुम्हें दुत्कारेगी, उलाहने देगी
और ललकारेगी, तुम्हारे अस्तित्व को ।
जब चिंतन स्वतंत्र नहीं होंगे
और उस क्षण, तम पूरी कोशिश करेगा
तुम्हें अपने आगोश में लेने की ।
जब कोई नहीं होगा ऐसा,
जो रोक सके या नियंत्रित कर सके,
इस नकारात्मक विचार-प्रवाह को,
उस खास बिन्दु पर,
जहाँ से निर्धारण होना है,
तुम्हारे भविष्य का ।
जब दिखाई नहीं देगी,
कोई भी राह ।
तब लौट जाना अपने बचपन में,
कुछ देर के लिए,
एक दूधमुँहा शिशु बनकर ।
और, रोते रहना बेहाल,
तब तक,
जब तक कि माँ ले न ले,
तुझे अपनी गोद में ।
और उसकी आँचल के तले, उसके सान्निध्य में,
तुम सो न जाओ चैन की नींद,
ये आश्वासन, ये विश्वास पाकर-
कि जब-जब आँखों मेँ आँसू होंगे,
माँ की गोद होगी -
जिसके सान्निध्य में हम भूल जाएँगे,
अपना हर गम ।
जब-जब जीवन की धूप होगी,
माँ खड़ी होगी पास, अपना आंचल फ़ैलाये ।
और जब-जब सपने टूटेंगे,
माँ की लोरियाँ सृजन करेंगी,
अगणित नूतन सपनों का ।
तब कोई भय, कोई असमंजस नहीं रहेगा,
बस रहेगा तो एक विश्वास,
जिसके होने पर ज़िन्दगी कभी उदास नहीं लगती ।
- राजेश 'आर्य' [ rajesh010439@gmail.com ]
Comments :
| Sri Prakash wrote... |
| Nice !! |
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