परिभाषा

 

 
प्रिये,
क्या तुम्हे बुरा लगेगा,
यदि तुम्हे केन्द्र बनाकर
अपनी रचना कर दूँ तो
याकि अपनी प्रेमकहानी ही
सबके सामने रख दूँ तो ??
 
 
मैं जानता हूँ प्रिये
कि शायद तुम सोचोगी
मेरा ये ढंग है प्रतिशोध लेने
या फिर दुनिया कि नजर में
सहानुभूति पाने का |
पर प्रिये,
ये जो कुछ भी पंक्तियाँ हैं
सब तुम्हारी ही तो हैं,
तुम्ही ने तो मुझे सिखाया था
निरर्थक शब्दों से अर्थ निकालना
और फिर उन्ही अर्थों को तोड़-मरोड़कर
नए-नए भाव निकालना  |
फिर जो भी प्रतिशोध या प्रसिद्धि है
तुम्हारी ही तो है |
सो मेरे शब्दों में अर्थ का सृजन करने वाली,
‘जननी’  तू,
तुम्हे लाज तो नहीं आएगी
जब मैं ये बताऊंगा
कि कैसे दुनिया की नजरों  से छिपकर,
तुमने मुझमे कवित्व को जन्म दिया ??
 
 
और फिर तुम्ही बताओ
दुनिया के किस रचनाकार ने
तुमसे प्रेरणा नहीं ली ?
पहली बार जब इन ‘बाँझ’  आँखों में,
‘भाव’ का प्रष्फुटन हुआ था,
तब तुम्ही सामने थे ना प्रिये |
फिर इन आँखों में
किसी और के  भाव का जामा पहनाकर
तुम्हे नकारने की हिम्मत मैं कैसे करूँ ?
मुझे वात्सल्य-स्नेह से सदा अभिसिंचित करने वाली,
‘भगिनी’ तू -
तुम आहत तो नहीं होगी,
जब मैं ये बताऊंगा
क़ि कैसे  तुम मुझे छोड़ गई थी,
एक रोज अचानक
मुझमे  संवेदना का पुट जगाकर ?
 
 
प्रिये,
मैं जानता हूँ तुम्हे भय है
क़ि दुनिया तुम्हे कोसने ना लगे
क़ि तुमने किसी स्वार्थ में आकर
कहानी को मझधार में छोड़ दिया |
पर प्रिये,
सच कहूँ तो मैं शुक्रगुजार हूँ तुम्हारा
क़ि तुमने
‘प्रेम’ के उस अंतिम भाव -
विरह से भी मुझे परिचित कराया,
जिसके बिना कोई कवि संपूर्ण नहीं होता |
और फिर पगली,
तुम्ही बताओ
दुनिया के किस कर्ता ने
अपनी कृति को
सम्पूर्णता  देने का प्रयास नहीं किया ?
फिर इसमें भय कैसा और आरोप कैसा ?
सो मुझे प्रेम के हर भाव से परिचित कराकर
मुझे संपूर्ण बनाने वाली,
मेरी वन्दिनी  तू -
तुम्हे गर्व नहीं होगा ?
जब मैं ‘परिभाषा’ बताऊंगा
प्रेम की
तुम्हारे माध्यम से |
 
 
क़ि प्रेमकहानी भले ही क्षणिक हो
प्रेम तो शाश्वत है |
वह मुक्त है
आदि और अंत से
दिशा और काल से
रिश्ते और बंधन से
सम्मान और कलंक  से |
प्रेम है,
इसलिए तो रचना है,
सृष्टि है, ईश्वर है, कवि है  |
अंततः हे प्रिये,
मैं इस बात से इनकार नहीं करता
क़ि इस रचना के दौरान
कुछ अंतरंग बातें सामने नहीं आएँगी
याकि कोई इस पवित्र रिश्ते को
संदेह क़ि दृष्टि से नहीं देखेगा |
पर दुनिया को प्रेम क़ि परिभाषा बताने के लिए
तुम इतना लांछन तो सह लोगी ना प्रिये |
प्रिये सच तो यह है क़ि,
मेरी सोच, मेरे स्वप्न
मेरी नैतिकता, मेरे आदर्श
सभी तो तुम्हारे पास गिरवी हैं,
मैं स्वतंत्र लिखूं भी तो कैसे ?
मैं कितनी भी कोशिश कर लूँ
कितने भी पात्र बदल लूँ
रचना हमेशा वही होती है |
फिर यथार्थ को कल्पना का नाम देकर,
रचना के साथ छल कैसे करूँ?
सो मेरे सुख-दुःख, हास-परिहास
सबमे सदा संग रहने वाली
संगिनी तू -
तुम्हे आपत्ति तो नहीं होगी
जब मैं ये बताऊंगा
क़ि कैसे हल्की- सी हंसी के बदले
तुमने मेरे सपनों को गिरवी रख लिया था ?
( समर्पित उस ‘देवी’ को, जिसने मुझे पवित्र प्रेम के सभी भावों से परिचित कराया )
- राजेश 'आर्य'  [ rajesh010439@gmail.com ]

                                                  

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