- राजेश 'आर्य' [ rajesh010439@gmail.com ]प्रिये,क्या तुम्हे बुरा लगेगा,यदि तुम्हे केन्द्र बनाकरअपनी रचना कर दूँ तोयाकि अपनी प्रेमकहानी हीसबके सामने रख दूँ तो ??मैं जानता हूँ प्रियेकि शायद तुम सोचोगीमेरा ये ढंग है प्रतिशोध लेनेया फिर दुनिया कि नजर मेंसहानुभूति पाने का |पर प्रिये,ये जो कुछ भी पंक्तियाँ हैंसब तुम्हारी ही तो हैं,तुम्ही ने तो मुझे सिखाया थानिरर्थक शब्दों से अर्थ निकालनाऔर फिर उन्ही अर्थों को तोड़-मरोड़करनए-नए भाव निकालना |फिर जो भी प्रतिशोध या प्रसिद्धि हैतुम्हारी ही तो है |सो मेरे शब्दों में अर्थ का सृजन करने वाली,‘जननी’ तू,तुम्हे लाज तो नहीं आएगीजब मैं ये बताऊंगाकि कैसे दुनिया की नजरों से छिपकर,तुमने मुझमे कवित्व को जन्म दिया ??और फिर तुम्ही बताओदुनिया के किस रचनाकार नेतुमसे प्रेरणा नहीं ली ?पहली बार जब इन ‘बाँझ’ आँखों में,‘भाव’ का प्रष्फुटन हुआ था,तब तुम्ही सामने थे ना प्रिये |फिर इन आँखों मेंकिसी और के भाव का जामा पहनाकरतुम्हे नकारने की हिम्मत मैं कैसे करूँ ?मुझे वात्सल्य-स्नेह से सदा अभिसिंचित करने वाली,‘भगिनी’ तू -तुम आहत तो नहीं होगी,जब मैं ये बताऊंगाक़ि कैसे तुम मुझे छोड़ गई थी,एक रोज अचानकमुझमे संवेदना का पुट जगाकर ?प्रिये,मैं जानता हूँ तुम्हे भय हैक़ि दुनिया तुम्हे कोसने ना लगेक़ि तुमने किसी स्वार्थ में आकरकहानी को मझधार में छोड़ दिया |पर प्रिये,सच कहूँ तो मैं शुक्रगुजार हूँ तुम्हाराक़ि तुमने‘प्रेम’ के उस अंतिम भाव -विरह से भी मुझे परिचित कराया,जिसके बिना कोई कवि संपूर्ण नहीं होता |और फिर पगली,तुम्ही बताओदुनिया के किस कर्ता नेअपनी कृति कोसम्पूर्णता देने का प्रयास नहीं किया ?फिर इसमें भय कैसा और आरोप कैसा ?सो मुझे प्रेम के हर भाव से परिचित कराकरमुझे संपूर्ण बनाने वाली,मेरी वन्दिनी तू -तुम्हे गर्व नहीं होगा ?जब मैं ‘परिभाषा’ बताऊंगाप्रेम कीतुम्हारे माध्यम से |क़ि प्रेमकहानी भले ही क्षणिक होप्रेम तो शाश्वत है |वह मुक्त हैआदि और अंत सेदिशा और काल सेरिश्ते और बंधन सेसम्मान और कलंक से |प्रेम है,इसलिए तो रचना है,सृष्टि है, ईश्वर है, कवि है |अंततः हे प्रिये,मैं इस बात से इनकार नहीं करताक़ि इस रचना के दौरानकुछ अंतरंग बातें सामने नहीं आएँगीयाकि कोई इस पवित्र रिश्ते कोसंदेह क़ि दृष्टि से नहीं देखेगा |पर दुनिया को प्रेम क़ि परिभाषा बताने के लिएतुम इतना लांछन तो सह लोगी ना प्रिये |प्रिये सच तो यह है क़ि,मेरी सोच, मेरे स्वप्नमेरी नैतिकता, मेरे आदर्शसभी तो तुम्हारे पास गिरवी हैं,मैं स्वतंत्र लिखूं भी तो कैसे ?मैं कितनी भी कोशिश कर लूँकितने भी पात्र बदल लूँरचना हमेशा वही होती है |फिर यथार्थ को कल्पना का नाम देकर,रचना के साथ छल कैसे करूँ?सो मेरे सुख-दुःख, हास-परिहाससबमे सदा संग रहने वालीसंगिनी तू -तुम्हे आपत्ति तो नहीं होगीजब मैं ये बताऊंगाक़ि कैसे हल्की- सी हंसी के बदलेतुमने मेरे सपनों को गिरवी रख लिया था ?( समर्पित उस ‘देवी’ को, जिसने मुझे पवित्र प्रेम के सभी भावों से परिचित कराया )
परिभाषा
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