|
*परिष्कृत जीवन प्रत्यक्ष कल्पवृक्ष
|
*समग्र-सफलताओं का मूल आधार
|
*तीन असाधारण सौभाग्य
|
*सत को समझें, सत को पकड़ें
|
|
* अक्लमंदी नहीं , बुद्धिमता अपनाएं
|
*प्रगति तो हो, पर उत्कृष्टता की दिशा में
|
*परिवर्तन में प्रगति और जीवन
|
*जीवन साधना की सिद्धि का रहस्य
|
|
* आज नहीं मिल पाया तो कल मिलेगा
|
*कर्म ही सर्वोपरि
|
*दूरदर्शिता का दोहरा लाभ
|
*समृद्ध और प्रगति का आधार बाहर नहीं अन्दर
|
|
* प्रार्थना अर्थात विनम्र पुरुषार्थ
|
*जीवन लक्ष्य की प्राप्ति में तीन प्रमुख व्यवधान
|
*स्रोत अन्दर है, बाहर नहीं
|
*साधना और सिद्धि का तत्वदर्शन
|
|
* आनंदप्राप्ति की दिशा
|
*आत्मिक विभूतियों का उभार, उत्कृष्ट जीवन में
|
*भूत न बनें रहने देवत्व की और बढ़ें
|
*ईश्वर उपासना से जुडी श्रेष्ठ भावनायें
|
|
* प्रतिकूलताओं से हडबड़ायें नहीं
|
*नरपशु का नारायण में परिवर्तन आत्मिकी का अवलंबन
|
*कर्मफल की सुनिश्चितता और प्रायश्चित की आवश्वकता
|
*उत्थान -पतन का आधार, आकांक्षाओं का परिष्कार
|
|
* आत्मसत्ता परमात्म सत्ता का मिलन संयोग
|
*समुद्रमंथन की पुनरावृति
|
*आदर्शवादी महत्वाकांक्षाओं के फलितार्थ
|
*"स्व" का विकास और समष्टिगत हित साधन
|
|
* करुणा में भगवान
|
*उतरोत्तर विकास एक जीवन चक्र
|
*चेतना के विकास में परिवेश का महत्व
|
*हम सब उनके पुत्र
|
|
* विचार शक्ति सन्मार्गगामी हो
|
*सार्वभौम सार्वजनीन माँ की उपासना
|
*बुद्धि की प्रखरता ही नहीं | भावनाओंकी उदात्तता भी
|
*युगधर्म की अवहेलना महंगी पड़ेगी
|
|
* अशुभ चिंतन छोडिये -भयमुक्त होइए
|
*उत्तरदायित्यों को निभाएं, महान बनें
|
*लक्ष्य की दिशा में अनवरत यात्रा
|
*कठिनाइयों का स्वागत कीजिये
|
|
* साधना से सिद्धि और मार्ग के अवरोध
|
*परिवर्तन असुविधाजनक होते हुए भी अपरिहार्य है
|
*मुस्कान सुसंस्कृति व्यक्ति की निशानी
|
*पैरों को तोड़ें नहीं, प्रगति की सहज यात्रा पर बढ़ने दें
|
|
* साधना और सिद्धि का सिद्धांत
|
*आस्था ही आस्तिकता
|
*देवता
|
*वरदानी शक्ति का देवता सुदृढ़ संकल्प
|
|
* तेरा विश्वास शक्ति बने, याचना नहीं
|
*जीवन, ईश्वर का स्वरूप एवं वरदान
|
*आनंद अपनी ही मुट्ठी में पड़ा है
|
*उपार्जन का सदुपयोग भी
|
|
* त्रिविध तनाव और उनसे छुटकारा
|
*दिशा निर्धारण मनुष्य का अपना निर्णय
|
*विचार शक्ति की अनंत सामर्थ्य
|
*परिष्कृत अंतःकरण मानव जीवन की श्रेष्ठ उपलब्धि
|
|
* विचारों में क्रम-व्यवस्था एवं एकाग्रता बनाए रखें
|
*सम्पदाएँ नहीं विभूतियाँ
|
*परमात्मा का अस्तित्व और अनुग्रह
|
*दृश्य नहीं दर्शक बनें
|
|
* जीवन और उसकी परिभाषा
|
*साधना पंथ और अनंत ऐश्वर्य
|
*वर्चस की साधना आत्मबल उभारने के लिए
|
*सर्वतोमुखी प्रगति के दो आधार - अध्यात्म और विज्ञान
|
|
* प्राण शक्ति - एक जीवंत उर्जा
|
*अभीष्ट की उपलब्धि भीतर से ही होगी
|
*अंतर की गहराई में उतरें
|
*क्षुद्रता अपनाने से मात्र हानि ही हानि है
|
|
* हम चिंतन की दृष्टि से भी प्रौढ़ बनें
|
*हम अहंकारी नहीं, स्वाभिमानी बनें
|
*यथार्थता और एकता में पूर्वाग्रहों की प्रधान बाधा
|
*सफलता आत्मविश्वासी को मिलाती है
|
|
* अपनी भूलों को समझें और उन्हें सुधारें
|
*विश्व उपवन में हमारा जीवन पुष्प सा महके
|
*मैं को जानने में ही ज्ञान की पूर्णता है
|
*आवरण बंधनों का विस्फोट
|
|
* प्रज्ञावतार की पुण्य वेला
|
*आत्म देवता की साधना और सिद्धि
|
*वैभव की जड़ें अन्तरंग की गहराई में धंसी होती हैं
|
*धर्म के बिना हमारा काम नहीं चलेगा
|
|
* सम्पति ही नहीं सदाशयता भी
|
*आत्म निर्भर बनें - अपने आप उठें
|
*सौंदर्य और शक्ति का स्रोत अंतस में
|
*उत्थान पतन की कुंजियाँ अपने हाथ में
|
|
* साधना से सिद्धि की प्राप्ति
|
*ध्यान योग से एकाग्रता की दिव्य शक्ति का उद्भव
|
*आत्म जागरण के लिए ध्यान योग की आवश्यकता
|
*आत्मीयता का विस्तार
|
|
* दुःख और सुख सहोदर-सहचर
|
*अपने को पहिचानें और विकसित करें
|
*विचारों की प्रचंड शक्ति और प्रतिक्रिया
|
*उदार जीवन यात्रा
|
|
* श्रम देवता की साधना
|
*ईश्वर का द्वार सबके लिए खुला है
|
*कर्म का प्रतिफल अकाट्य है
|
*आत्म त्याग ही सर्वोच्च धर्म
|
|
* अनंत आनंद का स्रोत - आध्यात्मिक जीवन
|
*आत्मिक प्रगति सद्ज्ञान पर निर्भर
|
*परमात्मा का प्यार और आशीर्वाद केवल सत्पात्रों को
|
*विश्व-धर्म और भारतीय आदर्श
|
|
* आज की सबसे बड़ी बुद्धिमत्ता और लोकसेवा
|
*विश्व का भावी धर्म - अध्यात्मवाद
|
*युग निर्माण आन्दोलन और उसका स्वरुप
|
*मानसिक शक्ति नष्ट न होने दीजिये
|
|
* परहित सरिस धरम नहिं भाई
|
*समस्त विग्रह और क्लेशों का मूल - अहंकार
|
*व्यवहार में औचित्य का समावेश
|
*आनंद रूपं अमृतं यद्विभाति
|
|
* सर्वश्रेष्ठ कलाकारिता
|
*जो गलेगा, वही उगेगा
|
*विचारणा का उच्चस्तरीय प्रवाह
|
*हम तुच्छ नहीं, गौरवास्पद जीवन जियें
|
|
* खाली हूजिये, आप लबालब भर जायेंगें
|
*समष्टि की साधना का तत्वदर्शन
|
*देवत्व है अंतिम लक्ष्य जिसका, वह है मनुष्य
|
*आँगन में विद्यमान कल्पवृक्ष
|
|
* हम मनस्वी और आत्मबल संपन्न बनें
|
*निष्ठा आत्मशक्ति की निर्झरिणी
|
*सच्ची और चिरस्थायी प्रगति के दो अवलंबन
|
*शरीर की रुग्णता में मनोविकार प्रधान कारण
|
|
* चमत्कार और सिद्धियों के भ्रम जंजाल में न भटकें, यथार्थता को समझें
|
*अधिक न बन पड़े तो भी थोडा तो करें हीं
|
*बुद्धिमता सर्वोपरि सम्पदा
|
*देवासुर संग्राम के इतिहास से शिक्षा ग्रहण करें
|
|
* अपने को न केवल देखें , समझें, सुधारें वरन उबारें भी
|
*मनोनिग्रह के लिए उपासना की आवश्यकता
|
*हम निष्ठावान बनें स्वर्ग का सृजन करें
|
*निरंतर देता है, वह निर्बाध पाता है
|
|
* 'बलमुपास्व' - बल की उपासना करो
|
*जीवन का अभिप्राय - दिव्य-प्रेम
|
*मस्तिष्क को उद्वेगग्रस्त न होने दें
|
*दूसरों का जीवन सुन्दर बनाने में सहायता करें
|
|
* आध्यात्मिक जीवन इस तरह जियें
|
*आदर्शों की रक्षा
|
*कर्म ही ईश्वर-उपासना
|
*मनुष्य से श्रेष्ठ और कुछ नहीं
|
|
* मन को जीतना - सबसे बड़ी विजय
|
*मन को दुर्बल न बनने दें
|
*हम देवत्व की और बढ़ें, असुरता की ओर नहीं
|
*समाज की अभिनव रचना - सद्विचारों से
|
|
* प्राणशक्ति एक जीवंत उर्जा
|
*आत्मविश्वास ईश्वर का अज्रस वरदान
|
*न तो हिम्मत हारें और न हार स्वीकार करें
|
*अपने को पहिचानें- आत्मबल संपादित करें
|
|
* कर्मकांड से ईश्वर को न फुसलाएँ
|
*प्रार्थना का स्वरुप, स्तर और प्रभाव
|
*आत्मपरिष्कार से परब्रह्म की प्राप्ति
|
*परमात्मा को भूलो मत
|
|
* मैं और मेरा नहीं, हम और हमारा
|
*हमारी इच्छाशक्ति प्रबल और प्रखर हो
|
*विद्या ही सफलता का मूल आधार है
|
*सत्य के लिए सर्वस्व का त्याग
|
|
* प्रार्थना आत्मा का संबल
|
*विचार ही चरित्र का निर्माण करते हैं
|
*प्रार्थना ही नहीं पवित्रता भी
|
*पुरुषार्थी ही पुरस्कारों के अधिकारी
|
|
* धर्म न तो अवैज्ञानिक है और न अनुपयोगी
|
*अनंत संभावनावों से युक्त मानवी सत्ता
|
*सौभाग्य भरे क्षणों को तिरस्कृत न करें
|
*आध्यात्मिकता- निष्क्रियता नहीं सिखाती
|
|
* व्रतशील जीवन की गरिमा
|
*दुर्बुद्धि और दुष्प्रवृतियों से छूटना ही मुक्ति है
|
*जीवन का अर्थ
|
*हम अपने को प्यार करें ताकि ईश्वर का प्यार पा सकें
|
|
* सत्य, प्रेम और करुणा की त्रिधारा
|
*जिसे जीना आता है, वह सच्चा कलाकार है
|
*मनुष्य वृक्ष वनस्पतियों से ही कुछ सीखे
|
*हमारे अधिक विरोधी क्यों बनते हैं ?
|
|
* कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग की साधना
|
*संकीर्णता के सीमा बंधन से छुटकारा पाएँ
|
*परमात्म-सत्ता से सम्बद्ध होने का माध्यम
|
*मुक्ति के लिए प्रयत्न
|
|
* कामनाओं को नियंत्रित और मर्यादित रखें
|
*ईश्वर हमारा सच्चा जीवन सहचर है
|
*आत्मा को देखें, खोजें और समझें
|
*सर्वोत्कृष्ठ परमार्थ - ज्ञानयज्ञ
|
|
* श्रद्धा से सत्य की प्राप्ति होती है
|
*उपासना अर्थात परमात्मा की समीपता
|
*विषम वेला में हमारा महान उत्तरदायित्व
|
*प्रकाश का दायित्व हमें ही पूरा करना होगा
|
|
* विश्व धर्म और भारतीय आदर्श
|
*विपत्तोयों को कैसे जीता जाय ?
|
*विचार शक्ति का जीवन पर प्रभाव
|
*जीवन सुन्दरता पूर्वक जियें
|
|
* परमात्मा को जानने के लिए अपने आपको को जानो
|
*ईश्वर-भक्ति और जीवन-विकास
|
*संसार का नवीन धर्म- अध्यात्म
|
*नये संसार का निर्माण
|
|
* अडिग निष्ठा से कार्य क्षेत्र में उतरें
|
*सद्बुद्धि की अवधारणा
|
*क्या हमारे लिए यही उचित है ?
|
*नर वानर देव मानव कैसे बनें
|
|
* मन को कुसंस्कारी न रहने दिया जाय
|
*सत्य का अवलंबन
|
*भक्त के लिए ईश्वर का उपहार
|
*शरीर को देव मंदिर बनाएं
|
|
* सूक्ष्म का महान सामर्थ्य
|
*निंदा से विचलित न हों, उसे महत्व न दें
|
*ज्ञान की महत्ता कर्म के साथ
|
*महान अवलंबन का परित्याग न करें
|
|
* अखंड ज्योति का स्वरुप और प्रभाव
|
*समर्थ का आश्रय लें
|
*सच्चा मानवोचित पुरुषार्थ
|
*चतुर बनें या बुद्धिमान
|
|
* इश्वर का दर्शन - पवित्र अंतःकरण में
|
*समर्थता का सदुपयोग
|
*भटकते न फिरें, ध्रुव के साथ जुड़े रहें
|
*दिव्य संभावना सुनिश्चित है
|
|
* उन्नति नहीं, प्रगति अभीष्ट
|
*अन्धकार को दीपक की चुनौती
|
*बड़प्पन की सही कसौटी
|
*जीवन सम्पदा का सदुपयोग
|
|
* आत्मा की आवाज़
|
*विधाता के बहुमूल्य उपहार
|
*याचना नहीं प्रार्थना
|
*सम्पदा को रोकें नहीं
|
|
* परमात्मा की आनंदमयी सत्ता
|
*दृश्य से परे विचारों की विलक्षण दुनिया
|
*जीवन बहुमूल्य है इसे न गवाएँ
|
*बंधन-मुक्ति का राजमार्ग
|
|
* नीति उपार्जन की बाइबिल शिक्षा
|
*शाश्वत जीवन को सुसंपन्न बनाना श्रेयस्कर है
|
*जानना तो अपने को भी चाहिए
|
*उठो जागो और विकास करो
|
|
* विराट को संबोधन
|
*मन को सुधारा-सधाया जा सकता है
|
*आनंदानुभूति के अपने-अपने रूप
|
*स्वच्छता और सुसंस्कारिता
|
|
* आत्म विजेता ही विश्व विजेता
|
*"प्रज्ञा" मानव को प्राप्त दैवी अनुदान
|
*प्रतिभा - जागरूकता और तत्परता की परिणति
|
*कठिनाइयां आवश्यक भी हैं, लाभदायक भी
|
|
* मानवी क्षमता का कोई पारावार नहीं
|
*विचारों की असाधारण सामर्थ्यें और परिणति
|
*परिशोधन प्रगति का प्रथम चरण
|
*विचारणा की पारसमणि
|
|
* वैभव की कमी नहीं, पर आवश्यकता जितनी ही समेटें
|
*मानव जीवन की विशिष्टता एवं सार्थकता
|
*उत्कर्ष का राजमार्ग
|
*शांति और सौंदर्य को अपने अन्दर खोजो
|
|
* जो दीपक की तरह जलने को तैयार हों
|
*सुरदुर्लभ मनुष्य जन्म की सार्थकता
|
*आत्मा और परमात्मा की एकता
|
*स्थिति के अनुरूप व्यवहार भिन्नता
|
|
* समग्र श्रेष्ठता विकसित करें
|
*मानवी प्रगति आकाँक्षाओं के स्तर पर निर्भर
|
*विस्मृति की मूर्च्छना
|
*विचार - एक अद्भुत प्रचंड शक्ति स्रोत
|
|
* सृजन चेतना की समर्थता और गरिमा
|
*दूरदर्शिता - एक बहुत बड़ा सौभाग्य
|
*तत्त्व ज्ञान और सेवा साधन
|
*प्रतिकूलताएँ कभी वाधक नहीं बनतीं
|
|
* कर्मण्येवाधिकारस्ते
|
*बुद्ध का लोकसेवी परिव्राजकों को सन्देश
|
*परिष्कृत एवं सोद्देश्य चिंतन साधना का अनिवार्य मार्ग
|
* जीवन कलाकार हाथोँ से संजोया जाय
|
|
* वैभव ही नहीं, विवेक भी
|
*धर्म न तो अवैज्ञानिक है और न अनुपयोगी
|
*मनुष्य भी ज्वालामुखी के तरह फूटता है
|
*गहरे उतरें , विभुतियाँ हस्तगत करें
|
|
* अध्यात्म क्षेत्र की सफलता का सुनिश्चित मार्ग
|
*अपने भाग्य का विधाता मनुष्य स्वयं
|
*अनेकता से एकता की और महायात्रा
|
* परिवर्तन प्रगति की पहले सीढ़ी
|
|
* विराट का वैभव अपने अंतर में
|
*सफल और प्रसन्न जीवन की कुंजी सफल और प्रसन्न जीवन की कुंजी
|
*विचार शक्ति
|
*स्वार्थ ही न सोचतें रहें - परमार्थ का भी ध्यान रखें
|
|
* चेतना के स्तर
|
*समय की माँग
|
*पवित्रता, महानता और संयमशीलता
|
*उपार्जन का सदुपयोग भी
|
|
* गुरु से काम नहीं चलेगा - सद् गुरु की शरण में जाएँ
|
*सत्यरूपी नारायण की साधना और उपलब्द्धि
|
*आलस त्यागें - सुसंपन्न बनें
|
*मनुष्य से श्रेष्ठ और कुछ नहीं
|
|
* सक्रिय जीवन
|
*आस्तिकता का असली स्वरुप
|
*धर्मरहित विज्ञान सर्वनाश करके छोडेगा
|
*अभीष्ट को अन्तरंग में खोजें
|
|
* त्रिविध तनाव और उनसे छूटकारा
|
*दिशा निर्धारण मनुष्य का अपना निर्णय
|
*विचारशक्ति की अनंत सामर्थ्य
|
*सफलता आत्विश्वासी को मिलती है
|
|
* धर्म के बिना हमारा काम नहीं चलेगा
|
*भ्रमजाल से छूटें मायामुक्त हों
|
*वैभव खोकर भी सत्यनिष्ठ बने रहें
|
*जीवन के दो प्रमुख तत्त्व आशा और गति
|
|
* यथार्थवादी बनें संकल्पबल विकसित करें
|
*प्रथकता छोडें - सामूहिकता अपनाएँ
|
*महाशून्य की यात्रा
|
*जीवन का कुछ उद्देश्य भी तो हो
|
|
* अपने सौभाग्य को सराहते रहें
|
*जीवन का अभिप्राय - दिव्य प्रेम
|
*सार्वभौमिक- उपासना
|
*कर्म ही ईश्वर - उपासना
|
|
* मन को दुर्बल न बनने दें
|
*आत्मत्याग ही सर्वोत्तम धर्म
|
*परमात्मा का आर्शीवाद और प्यार केवल सत्पात्रों को
|
*मानसिक शक्ति नष्ट न होने दीजिये
|
|
* प्रतिकूलताओं की चुनौती स्वीकार कीजिये
|
*धैर्य सीखिए
|
*प्रतिशोध की भावना छोडिये
|
*संकल्प और आत्मबल एक ही तथ्य के दो पक्ष हैं
|
|
* विचारों में क्रम-व्यवस्था एवं एकाग्रता बनाए रखें
|
*जीवन और उसकी परिभाषा
|
*यथार्थता और एकता में पूर्वाग्रहों की प्रधान बाधा
|
*मैं के जानने में ज्ञान की पूर्णता है
|
|
* हम निष्ठावान बनें स्वर्ग का सृजन करें
|
*निरीक्षण और नियंत्रण आदतों का भी करें
|
*यथार्थता को समझें - आग्रह न थोपें
|
*विधेयात्मक चिंतन से मानसिक संतुलन ठीक रखें
|
|
* परिष्कृत दृष्टिकोण का नाम ही स्वर्ग है
|
*ईश्वर की प्राप्ति सरलतम भी, कठिनतम भी
|
*समझदारी कृपणता में नहीं उदारता में है
|
*सत्य, तप और वैराग्य का समन्वय
|
|
* अपने दोषों को स्वीकारें और सुधारें
|
*प्रेम का अमरत्व और उसकी व्यापकता
|
*आदर्शों की रक्षा
|
*हमारी महत्वाकांक्षाएं निकृष्ट न हों
|
|
* सद्विचार अपनाए बिना कल्याण नहीं
|
*सेवा और प्रार्थना
|
*अनंत जीवन का स्रोत - आध्यात्मिक जीवन
|
*आज की सबसे बड़ी बुद्धिमता और लोकसेवा
|
|
* मित्रता और उसका निर्वाह
|
*तेरा विश्वास शक्ति बने, याचना नहीं
|
*सादगी अपनायें शालीनता बरतें
|
*अंतर की गहराई में उतरें
|
|
* अपनी भूलों को समझें और उन्हें सुधारें
|
*विश्व उपवन में हमारा जीवन पुष्प सा महके
|
*आत्मीयता का विस्तार
|
*दुःख और सुख - सहोदर सहचर
|
|
* अपने को पहचाने और विकसित करें
|
*विचारों की प्रचंड शक्ति और प्रतिक्रिया
|
*अंतर का परिष्कार सफल जीवन का आधार
|
*आत्मतत्व की अखंडता
|
|
* ईश्वर का अस्तित्व असिद्ध नहीं है
|
*प्रबल पुरुषार्थ से प्रतिकूलता भी अनुकूलता बनती है
|
*दृष्टिकोण बदले तो सब कुछ बदलेगा
|
*असफलता हमें हताश न कर पाए
|
|
* ईश्वर की समीपता और दूरी की परख
|
*जिंदगी जीनी हो तो इस तरह जियें
|
*न किसी को कैद करें, न कैदी बनें
|
*कर्म साधना की अनिवार्यता
|
|
* अंहकार के सर्प दंश से सदा बचे रहिये
|
*आत्मविश्वास की महती शक्ति - सामर्थ्य
|
*समाज की अभिनव रचना - सद् विचारों से
|
*आत्मिक प्रगति सद्ज्ञान पर निर्भर
|
|
* विश्व-धर्म और भारतीय आदर्श
|
*विश्व का भावी धर्म - अध्यात्मवाद
|
*महाकाल की पुकार
|
*अंहकार से सावधान
|
|
* इच्छाशक्ति के चमत्कार
|
*जीवन, ईश्वर का स्वरुप और वरदान
|
*साधना पथ और अनंत ऐश्वर्य
|
*अभीष्ट की उपलब्धि भीतर से ही होगी
|
|
* जीवन संपदा का सदुपयोग सीखा जाय
|
*अपनें पर भरोसा करें आप समर्थ हैं
|
*ध्यानयोग- चरम आत्मोकर्ष की साधना
|
*सत्य का आश्रय ईश्वर का आश्रय है
|
|
* हम सज्जनता अपनाएं - सहृदय बनें
|
*अंतःकरण में ईश्वर का दर्शन
|
*आत्मविश्वासी पर ही दुसरे भी विश्वास करते हैं
|
*जीवन की मूल प्रेरणा- कर्त्तव्य पालन
|
|
* 'उपासना' की सफलता 'साधना' पर निर्भर है
|
*आत्मिक प्रगति का आधार- संवेदना, सहानुभूति
|
*सच्चे सौंदर्य की खोज और साक्षात्कार
|
*दुःख की निवृति ज्ञान से ही संभव
|
|
* दूसरों का जीवन सुंदर बनाने में सहायता करें
|
*आध्यात्मिक जीवन इस तरह जियें
|
*मन को जीतना - सबसे बड़ी विजय
|
*दृष्टिकोण के अनुरूप संसार का स्वरुप
|
|
* युगनिर्माण आन्दोलन और उसका प्रयोजन
|
*व्यक्तिवाद नहीं, समाजवाद हमारा लक्ष्य हो
|
*अन्धकार का निराकरण आदर्शवादी व्यक्ति ही करेंगे
|
*सफलता के मणिमुक्तकों की प्राप्ति
|
|
* ईश्वर भक्त के लिए कसौटी
|
*और कोई रास्ता नहीं
|
*समस्त सफलताओं का हेतु - मन
|
*सेवा से सत्य-प्राप्ति
|
|
* भगवान को बार बार याद करो
|
*जमाने के साथ बदलिए
|
*धर्म एक महासागर
|
*परहित सरिस धरम नहिं भाई
|