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*परिष्कृत जीवन प्रत्यक्ष कल्पवृक्ष *समग्र-सफलताओं का मूल आधार *तीन असाधारण सौभाग्य *सत को समझें, सत को पकड़ें
* अक्लमंदी नहीं , बुद्धिमता अपनाएं *प्रगति तो हो, पर उत्कृष्टता की दिशा में *परिवर्तन में प्रगति और जीवन *जीवन साधना की सिद्धि का रहस्य
* आज नहीं मिल पाया तो कल मिलेगा *कर्म ही सर्वोपरि *दूरदर्शिता का दोहरा लाभ *समृद्ध और प्रगति का आधार बाहर नहीं अन्दर
* प्रार्थना अर्थात विनम्र पुरुषार्थ *जीवन लक्ष्य की प्राप्ति में तीन प्रमुख व्यवधान *स्रोत अन्दर है, बाहर नहीं *साधना और सिद्धि का तत्वदर्शन
* आनंदप्राप्ति की दिशा *आत्मिक विभूतियों का उभार, उत्कृष्ट जीवन में *भूत न बनें रहने देवत्व की और बढ़ें *ईश्वर उपासना से जुडी श्रेष्ठ भावनायें
* प्रतिकूलताओं से हडबड़ायें नहीं *नरपशु का नारायण में परिवर्तन आत्मिकी का अवलंबन *कर्मफल की सुनिश्चितता और प्रायश्चित की आवश्वकता *उत्थान -पतन का आधार, आकांक्षाओं का परिष्कार
* आत्मसत्ता परमात्म सत्ता का मिलन संयोग *समुद्रमंथन की पुनरावृति *आदर्शवादी महत्वाकांक्षाओं के फलितार्थ *"स्व" का विकास और समष्टिगत हित साधन
* करुणा में भगवान *उतरोत्तर विकास एक जीवन चक्र *चेतना के विकास में परिवेश का महत्व *हम सब उनके पुत्र
* विचार शक्ति सन्मार्गगामी हो *सार्वभौम सार्वजनीन माँ की उपासना *बुद्धि की प्रखरता ही नहीं | भावनाओंकी उदात्तता भी *युगधर्म की अवहेलना महंगी पड़ेगी
* अशुभ चिंतन छोडिये -भयमुक्त होइए *उत्तरदायित्यों को निभाएं, महान बनें *लक्ष्य की दिशा में अनवरत यात्रा *कठिनाइयों का स्वागत कीजिये
* साधना से सिद्धि और मार्ग के अवरोध *परिवर्तन असुविधाजनक होते हुए भी अपरिहार्य है *मुस्कान सुसंस्कृति व्यक्ति की निशानी *पैरों को तोड़ें नहीं, प्रगति की सहज यात्रा पर बढ़ने दें
* साधना और सिद्धि का सिद्धांत *आस्था ही आस्तिकता *देवता *वरदानी शक्ति का देवता सुदृढ़ संकल्प
* तेरा विश्वास शक्ति बने, याचना नहीं *जीवन, ईश्वर का स्वरूप एवं वरदान *आनंद अपनी ही मुट्ठी में पड़ा है *उपार्जन का सदुपयोग भी
* त्रिविध तनाव और उनसे छुटकारा *दिशा निर्धारण मनुष्य का अपना निर्णय *विचार शक्ति की अनंत सामर्थ्य *परिष्कृत अंतःकरण मानव जीवन की श्रेष्ठ उपलब्धि
* विचारों में क्रम-व्यवस्था एवं एकाग्रता बनाए रखें *सम्पदाएँ नहीं विभूतियाँ *परमात्मा का अस्तित्व और अनुग्रह *दृश्य नहीं दर्शक बनें
* जीवन और उसकी परिभाषा *साधना पंथ और अनंत ऐश्वर्य *वर्चस की साधना आत्मबल उभारने के लिए *सर्वतोमुखी प्रगति के दो आधार - अध्यात्म और विज्ञान
* प्राण शक्ति - एक जीवंत उर्जा *अभीष्ट की उपलब्धि भीतर से ही होगी *अंतर की गहराई में उतरें *क्षुद्रता अपनाने से मात्र हानि ही हानि है
* हम चिंतन की दृष्टि से भी प्रौढ़ बनें *हम अहंकारी नहीं, स्वाभिमानी बनें *यथार्थता और एकता में पूर्वाग्रहों की प्रधान बाधा *सफलता आत्मविश्वासी को मिलाती है
* अपनी भूलों को समझें और उन्हें सुधारें *विश्व उपवन में हमारा जीवन पुष्प सा महके *मैं को जानने में ही ज्ञान की पूर्णता है *आवरण बंधनों का विस्फोट
* प्रज्ञावतार की पुण्य वेला *आत्म देवता की साधना और सिद्धि *वैभव की जड़ें अन्तरंग की गहराई में धंसी होती हैं *धर्म के बिना हमारा काम नहीं चलेगा
* सम्पति ही नहीं सदाशयता भी *आत्म निर्भर बनें - अपने आप उठें *सौंदर्य और शक्ति का स्रोत अंतस में *उत्थान पतन की कुंजियाँ अपने हाथ में
* साधना से सिद्धि की प्राप्ति *ध्यान योग से एकाग्रता की दिव्य शक्ति का उद्भव *आत्म जागरण के लिए ध्यान योग की आवश्यकता *आत्मीयता का विस्तार
* दुःख और सुख सहोदर-सहचर *अपने को पहिचानें और विकसित करें *विचारों की प्रचंड शक्ति और प्रतिक्रिया *उदार जीवन यात्रा
* श्रम देवता की साधना *ईश्वर का द्वार सबके लिए खुला है *कर्म का प्रतिफल अकाट्य है *आत्म त्याग ही सर्वोच्च धर्म
* अनंत आनंद का स्रोत - आध्यात्मिक जीवन *आत्मिक प्रगति सद्ज्ञान पर निर्भर *परमात्मा का प्यार और आशीर्वाद केवल सत्पात्रों को *विश्व-धर्म और भारतीय आदर्श
* आज की सबसे बड़ी बुद्धिमत्ता और लोकसेवा *विश्व का भावी धर्म - अध्यात्मवाद *युग निर्माण आन्दोलन और उसका स्वरुप *मानसिक शक्ति नष्ट न होने दीजिये
* परहित सरिस धरम नहिं भाई *समस्त विग्रह और क्लेशों का मूल - अहंकार *व्यवहार में औचित्य का समावेश *आनंद रूपं अमृतं यद्विभाति
* सर्वश्रेष्ठ कलाकारिता *जो गलेगा, वही उगेगा *विचारणा का उच्चस्तरीय प्रवाह *हम तुच्छ नहीं, गौरवास्पद जीवन जियें
* खाली हूजिये, आप लबालब भर जायेंगें *समष्टि की साधना का तत्वदर्शन *देवत्व है अंतिम लक्ष्य जिसका, वह है मनुष्य *आँगन में विद्यमान कल्पवृक्ष
* हम मनस्वी और आत्मबल संपन्न बनें *निष्ठा आत्मशक्ति की निर्झरिणी *सच्ची और चिरस्थायी प्रगति के दो अवलंबन *शरीर की रुग्णता में मनोविकार प्रधान कारण
* चमत्कार और सिद्धियों के भ्रम जंजाल में न भटकें, यथार्थता को समझें *अधिक न बन पड़े तो भी थोडा तो करें हीं *बुद्धिमता सर्वोपरि सम्पदा *देवासुर संग्राम के इतिहास से शिक्षा ग्रहण करें
* अपने को न केवल देखें , समझें, सुधारें वरन उबारें भी *मनोनिग्रह के लिए उपासना की आवश्यकता *हम निष्ठावान बनें स्वर्ग का सृजन करें *निरंतर देता है, वह निर्बाध पाता है
* 'बलमुपास्व' - बल की उपासना करो *जीवन का अभिप्राय - दिव्य-प्रेम *मस्तिष्क को उद्वेगग्रस्त न होने दें *दूसरों का जीवन सुन्दर बनाने में सहायता करें
* आध्यात्मिक जीवन इस तरह जियें *आदर्शों की रक्षा *कर्म ही ईश्वर-उपासना *मनुष्य से श्रेष्ठ और कुछ नहीं
* मन को जीतना - सबसे बड़ी विजय *मन को दुर्बल न बनने दें *हम देवत्व की और बढ़ें, असुरता की ओर नहीं *समाज की अभिनव रचना - सद्विचारों से
* प्राणशक्ति एक जीवंत उर्जा *आत्मविश्वास ईश्वर का अज्रस वरदान *न तो हिम्मत हारें और न हार स्वीकार करें *अपने को पहिचानें- आत्मबल संपादित करें
* कर्मकांड से ईश्वर को न फुसलाएँ *प्रार्थना का स्वरुप, स्तर और प्रभाव *आत्मपरिष्कार से परब्रह्म की प्राप्ति *परमात्मा को भूलो मत
* मैं और मेरा नहीं, हम और हमारा *हमारी इच्छाशक्ति प्रबल और प्रखर हो *विद्या ही सफलता का मूल आधार है *सत्य के लिए सर्वस्व का त्याग
* प्रार्थना आत्मा का संबल *विचार ही चरित्र का निर्माण करते हैं *प्रार्थना ही नहीं पवित्रता भी *पुरुषार्थी ही पुरस्कारों के अधिकारी
* धर्म न तो अवैज्ञानिक है और न अनुपयोगी *अनंत संभावनावों से युक्त मानवी सत्ता *सौभाग्य भरे क्षणों को तिरस्कृत न करें *आध्यात्मिकता- निष्क्रियता नहीं सिखाती
* व्रतशील जीवन की गरिमा *दुर्बुद्धि और दुष्प्रवृतियों से छूटना ही मुक्ति है *जीवन का अर्थ *हम अपने को प्यार करें ताकि ईश्वर का प्यार पा सकें
* सत्य, प्रेम और करुणा की त्रिधारा *जिसे जीना आता है, वह सच्चा कलाकार है *मनुष्य वृक्ष वनस्पतियों से ही कुछ सीखे *हमारे अधिक विरोधी क्यों बनते हैं ?
* कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग की साधना *संकीर्णता के सीमा बंधन से छुटकारा पाएँ *परमात्म-सत्ता से सम्बद्ध होने का माध्यम *मुक्ति के लिए प्रयत्न
* कामनाओं को नियंत्रित और मर्यादित रखें *ईश्वर हमारा सच्चा जीवन सहचर है *आत्मा को देखें, खोजें और समझें *सर्वोत्कृष्ठ परमार्थ - ज्ञानयज्ञ
* श्रद्धा से सत्य की प्राप्ति होती है *उपासना अर्थात परमात्मा की समीपता *विषम वेला में हमारा महान उत्तरदायित्व *प्रकाश का दायित्व हमें ही पूरा करना होगा
* विश्व धर्म और भारतीय आदर्श *विपत्तोयों को कैसे जीता जाय ? *विचार शक्ति का जीवन पर प्रभाव *जीवन सुन्दरता पूर्वक जियें
* परमात्मा को जानने के लिए अपने आपको को जानो *ईश्वर-भक्ति और जीवन-विकास *संसार का नवीन धर्म- अध्यात्म *नये संसार का निर्माण
* अडिग निष्ठा से कार्य क्षेत्र में उतरें *सद्बुद्धि की अवधारणा *क्या हमारे लिए यही उचित है ? *नर वानर देव मानव कैसे बनें
* मन को कुसंस्कारी न रहने दिया जाय *सत्य का अवलंबन *भक्त के लिए ईश्वर का उपहार *शरीर को देव मंदिर बनाएं
* सूक्ष्म का महान सामर्थ्य *निंदा से विचलित न हों, उसे महत्व न दें *ज्ञान की महत्ता कर्म के साथ *महान अवलंबन का परित्याग न करें
* अखंड ज्योति का स्वरुप और प्रभाव *समर्थ का आश्रय लें *सच्चा मानवोचित पुरुषार्थ *चतुर बनें या बुद्धिमान
* इश्वर का दर्शन - पवित्र अंतःकरण में *समर्थता का सदुपयोग *भटकते न फिरें, ध्रुव के साथ जुड़े रहें *दिव्य संभावना सुनिश्चित है
* उन्नति नहीं, प्रगति अभीष्ट *अन्धकार को दीपक की चुनौती *बड़प्पन की सही कसौटी *जीवन सम्पदा का सदुपयोग
* आत्मा की आवाज़ *विधाता के बहुमूल्य उपहार *याचना नहीं प्रार्थना *सम्पदा को रोकें नहीं
* परमात्मा की आनंदमयी सत्ता *दृश्य से परे विचारों की विलक्षण दुनिया *जीवन बहुमूल्य है इसे न गवाएँ *बंधन-मुक्ति का राजमार्ग
* नीति उपार्जन की बाइबिल शिक्षा *शाश्वत जीवन को सुसंपन्न बनाना श्रेयस्कर है *जानना तो अपने को भी चाहिए *उठो जागो और विकास करो
* विराट को संबोधन *मन को सुधारा-सधाया जा सकता है *आनंदानुभूति के अपने-अपने रूप *स्वच्छता और सुसंस्कारिता
* आत्म विजेता ही विश्व विजेता *"प्रज्ञा" मानव को प्राप्त दैवी अनुदान *प्रतिभा - जागरूकता और तत्परता की परिणति *कठिनाइयां आवश्यक भी हैं, लाभदायक भी
* मानवी क्षमता का कोई पारावार नहीं *विचारों की असाधारण सामर्थ्यें और परिणति *परिशोधन प्रगति का प्रथम चरण *विचारणा की पारसमणि
* वैभव की कमी नहीं, पर आवश्यकता जितनी ही समेटें *मानव जीवन की विशिष्टता एवं सार्थकता *उत्कर्ष का राजमार्ग *शांति और सौंदर्य को अपने अन्दर खोजो
* जो दीपक की तरह जलने को तैयार हों *सुरदुर्लभ मनुष्य जन्म की सार्थकता *आत्मा और परमात्मा की एकता *स्थिति के अनुरूप व्यवहार भिन्नता
* समग्र श्रेष्ठता विकसित करें *मानवी प्रगति आकाँक्षाओं के स्तर पर निर्भर *विस्मृति की मूर्च्छना *विचार - एक अद्भुत प्रचंड शक्ति स्रोत
* सृजन चेतना की समर्थता और गरिमा *दूरदर्शिता - एक बहुत बड़ा सौभाग्य *तत्त्व ज्ञान और सेवा साधन *प्रतिकूलताएँ कभी वाधक नहीं बनतीं
* कर्मण्येवाधिकारस्ते *बुद्ध का लोकसेवी परिव्राजकों को सन्देश *परिष्कृत एवं सोद्देश्य चिंतन साधना का अनिवार्य मार्ग * जीवन कलाकार हाथोँ से संजोया जाय
* वैभव ही नहीं, विवेक भी *धर्म न तो अवैज्ञानिक है और न अनुपयोगी *मनुष्य भी ज्वालामुखी के तरह फूटता है *गहरे उतरें , विभुतियाँ हस्तगत करें
* अध्यात्म क्षेत्र की सफलता का सुनिश्चित मार्ग *अपने भाग्य का विधाता मनुष्य स्वयं *अनेकता से एकता की और महायात्रा * परिवर्तन प्रगति की पहले सीढ़ी
* विराट का वैभव अपने अंतर में *सफल और प्रसन्न जीवन की कुंजी सफल और प्रसन्न जीवन की कुंजी *विचार शक्ति *स्वार्थ ही न सोचतें रहें - परमार्थ का भी ध्यान रखें
* चेतना के स्तर *समय की माँग *पवित्रता, महानता और संयमशीलता *उपार्जन का सदुपयोग भी
* गुरु से काम नहीं चलेगा - सद् गुरु की शरण में जाएँ *सत्यरूपी नारायण की साधना और उपलब्द्धि *आलस त्यागें - सुसंपन्न बनें *मनुष्य से श्रेष्ठ और कुछ नहीं
* सक्रिय जीवन *आस्तिकता का असली स्वरुप *धर्मरहित विज्ञान सर्वनाश करके छोडेगा *अभीष्ट को अन्तरंग में खोजें
* त्रिविध तनाव और उनसे छूटकारा *दिशा निर्धारण मनुष्य का अपना निर्णय *विचारशक्ति की अनंत सामर्थ्य *सफलता आत्विश्वासी को मिलती है
* धर्म के बिना हमारा काम नहीं चलेगा *भ्रमजाल से छूटें मायामुक्त हों *वैभव खोकर भी सत्यनिष्ठ बने रहें *जीवन के दो प्रमुख तत्त्व आशा और गति
* यथार्थवादी बनें संकल्पबल विकसित करें *प्रथकता छोडें - सामूहिकता अपनाएँ *महाशून्य की यात्रा *जीवन का कुछ उद्देश्य भी तो हो
* अपने सौभाग्य को सराहते रहें *जीवन का अभिप्राय - दिव्य प्रेम *सार्वभौमिक- उपासना *कर्म ही ईश्वर - उपासना
* मन को दुर्बल न बनने दें *आत्मत्याग ही सर्वोत्तम धर्म *परमात्मा का आर्शीवाद और प्यार केवल सत्पात्रों को *मानसिक शक्ति नष्ट न होने दीजिये
* प्रतिकूलताओं की चुनौती स्वीकार कीजिये *धैर्य सीखिए *प्रतिशोध की भावना छोडिये *संकल्प और आत्मबल एक ही तथ्य के दो पक्ष हैं
* विचारों में क्रम-व्यवस्था एवं एकाग्रता बनाए रखें *जीवन और उसकी परिभाषा *यथार्थता और एकता में पूर्वाग्रहों की प्रधान बाधा *मैं के जानने में ज्ञान की पूर्णता है
* हम निष्ठावान बनें स्वर्ग का सृजन करें *निरीक्षण और नियंत्रण आदतों का भी करें *यथार्थता को समझें - आग्रह न थोपें *विधेयात्मक चिंतन से मानसिक संतुलन ठीक रखें
* परिष्कृत दृष्टिकोण का नाम ही स्वर्ग है *ईश्वर की प्राप्ति सरलतम भी, कठिनतम भी *समझदारी कृपणता में नहीं उदारता में है *सत्य, तप और वैराग्य का समन्वय
* अपने दोषों को स्वीकारें और सुधारें *प्रेम का अमरत्व और उसकी व्यापकता *आदर्शों की रक्षा *हमारी महत्वाकांक्षाएं निकृष्ट न हों
* सद्विचार अपनाए बिना कल्याण नहीं *सेवा और प्रार्थना *अनंत जीवन का स्रोत - आध्यात्मिक जीवन *आज की सबसे बड़ी बुद्धिमता और लोकसेवा
* मित्रता और उसका निर्वाह *तेरा विश्वास शक्ति बने, याचना नहीं *सादगी अपनायें शालीनता बरतें *अंतर की गहराई में उतरें
* अपनी भूलों को समझें और उन्हें सुधारें *विश्व उपवन में हमारा जीवन पुष्प सा महके *आत्मीयता का विस्तार *दुःख और सुख - सहोदर सहचर
* अपने को पहचाने और विकसित करें *विचारों की प्रचंड शक्ति और प्रतिक्रिया *अंतर का परिष्कार सफल जीवन का आधार *आत्मतत्व की अखंडता
* ईश्वर का अस्तित्व असिद्ध नहीं है *प्रबल पुरुषार्थ से प्रतिकूलता भी अनुकूलता बनती है *दृष्टिकोण बदले तो सब कुछ बदलेगा *असफलता हमें हताश न कर पाए
* ईश्वर की समीपता और दूरी की परख *जिंदगी जीनी हो तो इस तरह जियें *न किसी को कैद करें, न कैदी बनें *कर्म साधना की अनिवार्यता
* अंहकार के सर्प दंश से सदा बचे रहिये *आत्मविश्वास की महती शक्ति - सामर्थ्य *समाज की अभिनव रचना - सद् विचारों से *आत्मिक प्रगति सद्ज्ञान पर निर्भर
* विश्व-धर्म और भारतीय आदर्श *विश्व का भावी धर्म - अध्यात्मवाद *महाकाल की पुकार *अंहकार से सावधान
* इच्छाशक्ति के चमत्कार *जीवन, ईश्वर का स्वरुप और वरदान *साधना पथ और अनंत ऐश्वर्य *अभीष्ट की उपलब्धि भीतर से ही होगी
* जीवन संपदा का सदुपयोग सीखा जाय *अपनें पर भरोसा करें आप समर्थ हैं *ध्यानयोग- चरम आत्मोकर्ष की साधना *सत्य का आश्रय ईश्वर का आश्रय है
* हम सज्जनता अपनाएं - सहृदय बनें *अंतःकरण में ईश्वर का दर्शन *आत्मविश्वासी पर ही दुसरे भी विश्वास करते हैं *जीवन की मूल प्रेरणा- कर्त्तव्य पालन
* 'उपासना' की सफलता 'साधना' पर निर्भर है *आत्मिक प्रगति का आधार- संवेदना, सहानुभूति *सच्चे सौंदर्य की खोज और साक्षात्कार *दुःख की निवृति ज्ञान से ही संभव
* दूसरों का जीवन सुंदर बनाने में सहायता करें *आध्यात्मिक जीवन इस तरह जियें *मन को जीतना - सबसे बड़ी विजय *दृष्टिकोण के अनुरूप संसार का स्वरुप
* युगनिर्माण आन्दोलन और उसका प्रयोजन *व्यक्तिवाद नहीं, समाजवाद हमारा लक्ष्य हो *अन्धकार का निराकरण आदर्शवादी व्यक्ति ही करेंगे *सफलता के मणिमुक्तकों की प्राप्ति
* ईश्वर भक्त के लिए कसौटी *और कोई रास्ता नहीं *समस्त सफलताओं का हेतु - मन *सेवा से सत्य-प्राप्ति
* भगवान को बार बार याद करो *जमाने के साथ बदलिए *धर्म एक महासागर *परहित सरिस धरम नहिं भाई