पूज्य पिताजी के जन्मदिवस पर� 

इस पावन अवसर पर मैं कुछ मांग रहा हूँ आपसे,
अपनी अनुकम्पा वृष्टि कर शुभ आषीश सदा देना!

हो जाऊँ जब मैं निराश जगती के निष्ठुर वार से,
मुझको अपने पास बुलाकर अपने गले लगा लेना!

कभी कदम हों डगमग मेरे, तनिक फ़िरूं कर्त्तव्यों से,
बचपन के दिन याद दिलाकर मीठी डांट लगा देना!

आप सरित-जल, जलज हैं हम, श्री सद्-गुरू विराट सागर हैं,
अपनी उंगली पकड़ाकर सागर की गोद बिठा देना!

रह रहे आपसे दूर नित्य दे रहे अनेकों कष्ट हैं,
हैं अबोध बालक इसको एक भूल समझ बिसरा देना!

है यह अंतिम सहज प्रार्थना एक पिता से अर्जी है,
रहो कहीं इस दास को अपने श्री चरणों में जगह देना!!


- रोहित श्रीवास्तव 'अथर्व'  [ connectingrohitit@gmail.com ]

                                                  

Comments :

Sri Prakash ( sriprakash.rai@gmail.com ) wrote...
nice !!


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