तो स्वीकार मुझको नमन है तुम्हारा!!
चारों तरफ़ घोर विपदा प्रलय हो,
भले ज्वार � भाटे सा निष्ठुर समय हो!
हे भागीरथी! तुच्छ सागर में लेकिन,
कि जब तक तुम्हारा अकिंचन विलय हो!!
अगर तुम बहाती रहो प्रेमधारा�
तो स्वीकार मुझको नमन है तुम्हारा!!मैं हूँ साथ हर पल में, रहना निडर तुम,
मैं झेलूंगा दुख, खुश रहो उम्र भर तुम!
मगर जब भी जगती की ठोकर मैं खाऊँ,
मुझे प्यार से देखकर तब अगर तुम!!
ह्रदय से लगाओ, मुझे दो सहारा�
तो स्वीकार मुझको नमन है तुम्हारा!!मैं गाता रहा प्रेम के गीत हर पल,
तुम्हारी ही यादों की जिनमें थी कल-कल!
तुम्हें इतना चाहा, यूँ हर क्षण बिताया,
जैसे कि गिरधर की मीरा हो पागल!!
मगर जब कभी मेरे स्वर डूब जायें,
मेरे प्राण, तन से चलें, कंठ आयें!
मेरे गीत को तब मिले स्वर तुम्हारा�
तो स्वीकार मुझको नमन है तुम्हारा!!
- रोहित श्रीवास्तव 'अथर्व' [ connectingrohitit@gmail.com ]
Comments :
| Sri Prakash ( sriprakash.rai@gmail.com ) wrote... |
| nice !! |
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