|
श्रीगुरु
श्रीराम शर्मा आचार्य चालीसा ( स्वांत सुखाय ) |
| |
|
|
|
|
| |
वेद मूर्ति तपोनिष्ठ |
, |
प्रखर
प्रज्ञावान
|
| |
| |
अवतारी चेतना गुरु |
, |
अतुलित महा प्राण |
|| दोहा १ |
| |
|
|
|
|
| |
परमारथ हित अवतरित |
, |
स्थूल
जगत पड़ाव |
| |
| |
जस पथ दे व्यापक हुई |
, |
तस गति जीवन भाव |
| दोहा २ |
|
|
|
|
|
| |
जय
जय हे गुरु श्रीरामा |
| |
जय मातु
भगवती सुखधामा
|
|| १ |
|
जिनके सुमिरन
से यश पावे |
| |
बुद्धि
विवेक देवत्व बढावे |
|| २ |
|
दुविधा संकट
सब कट जावे |
| |
जो विचार
सतगुरु अपनावे |
|| ३ |
|
तुम्हरी
कृपा विपदाहारी |
| |
सिद्ध
गायत्री ब्रह्म ऋषि भारी
|
|| ४ |
| |
तुम सम
कोउ दयालु न देखा |
| |
अद्भूत
वाक् - शक्ति वा लेखा
|
|| ५ |
| |
हे
विश्व के भाग्य विधाता
|
| |
कलह
द्वेष असुरता त्राता
|
|| ६ |
|
देव
संस्कृति के उन्नायक
|
| |
युग
युगांतर के मह नायक
|
|| ७ |
|
कबीर
रामकृष्ण बन आये |
| |
युग
अनुरूप लीला दिखलाये
|
|| ८ |
| |
समय
समय पर धरा शरीरा |
| |
रामदास
गुरु - शिवाजी वीरा
|
|| ९ |
| |
माता दानकुंवरी
सत् सुमती |
| |
सहधर्मिणी श्री
मातु भगवती
|
|| १० |
| |
पिता
रूपकिशोर बड भागी |
| |
जनम जनम का पुन फल
जागी |
|| ११ |
|
साधक
सिद्ध तपस्वी संता |
| |
लेखक
प्रवचक रूप अनंता
|
|| १२ |
| |
युग
महान संगठन
कारी |
| |
महाकाल
के चेतन धारी
|
|| १३ |
| |
जापर
कृपा गुरु की होई
|
| |
जगे चेतना
यदि है सोई
|
|| १४ |
| |
शिष्य
निरंतर सत् चेतन गामी |
| |
सरल राह
सत् चित अनुगामी
|
|| १५ |
| |
नित
नित उपजे शुभ विचारा |
| |
भागे अंध
असमंजस सारा
|
|| १६ |
|
स्नेह
सना संरक्षण भासे |
| |
साधक
सुपथ सुचिन्तन रासे
|
|| १७ |
| |
जो भी
गुरु के शरण में आया |
| |
खाली हाथ
नहीं लौटाया
|
|| १८ |
| |
चमत्कार
अगणित परकारा |
| |
रोग
मुक्ति संतान सहारा
|
|| १९ |
| |
पथ
साधना गहै अति वेगा |
| |
यात्रा सुगम
अलौकिक नेगा
|
|| २० |
| |
नहीं
भ्रम नाहीं भटकावा |
| |
नित नवीन
अनुभव सुख लावा
|
|| २१ |
| |
अन्धकार
पर घात कुठारा |
| |
ज्ञान प्रकाश
उपजे हिय सारा
|
|| २२ |
|
भागीरथ
युग के कहलाये |
| |
जो आये
संवेदना पाए
|
|| २३ |
| |
तप
से सूक्ष्म जगत हिलाया |
| |
अगणित ब्रह्म
बीज उपजाया |
|| २४ |
| |
वेद
सार की सुधा पिलाई |
| |
गुरु साहित्य
अति फलदायी
|
|| २५ |
| |
काल
प्रवाह का मोडे रूख |
| |
महाकाल प्रतिनिधि बन
सम्मुख |
|| २६ |
|
गुरु
विचार धारे जो कोई
|
| |
तजे
कुपंथ पथिक सत् होई
|
|| २७ |
| |
रोग शोक
भय निकट न आवें |
| |
आध्यात्मिक
धन सुख पावें |
|| २८ |
| |
दिव्य
दृष्टि खुल जाती उसकी |
| |
विवेक
पूर्ण पथ जीवन की |
|| २९ |
| |
राह
नहीं पलायनवादी |
| |
सद
गृहस्थी जीवन सादी
|
|| ३० |
| |
दूजों का
भी साधक ध्याना
|
| |
पर सेवा
से नहीं अघाना
|
|| ३१ |
| |
होत शिष्य
ह्रदय अति बे मल |
| |
प्रज्ञा प्रखर
श्रद्धा अति सजल |
|| ३२ |
| |
गायत्री
को सुलभ बनाया
|
| |
यज्ञ
प्रथा घर घर पहुंचाया
|
|| ३३ |
|
परंपरा
ऋषि की जिलाए
|
| |
युगानुकूल
ही रूप दिलाये
|
|| ३४ |
| |
याज्ञवल्क्य
वशिष्ठ वा नारद |
| |
विश्वामित्र
प्रथा निरापद
|
|| ३५ |
| |
परशुराम कुरीति उन्मूलन |
| |
युग व्यास सद वृति संवर्धन |
|| ३६ |
| |
चरक पतंजलि अति हित
करणी |
| |
बह चली
पावन निर्झरणी |
|| ३७ |
| |
मातु तपस्थली
अति कल्याणी
|
| |
यह टकसाल
है युग निर्माणी
|
|| ३८ |
| |
गंगोत्री
यह ज्ञान गंगा की |
| |
मिलीं धाराएं कर्म
भक्ति की |
|| ३९ |
|
साधक
जिसमें करे स्नाना
|
| |
धुले कषाय
उपजे सुख नाना
|
|| ४० |
| |
|
|
|
|
| |
गुरु बताये राह पर |
, |
गति लावे जो कोय |
| |
| |
तापर कृपा प्रसन्नता |
, |
महाकाल की होय
|
|| दोहा ३ |
| |
|
|
|
|
Comments :