रतिमाया, धन और चंचल मन
1. माया जाल फैलाई, फ़ेंक मोहिनी शक्ति.
बुड्ढा मन भी फंस गया, क्योंकि अपरिष्कृत..
2. बचपन व यौवन देखा, बुढापा आ धमका.
फिर भी माया दिखे, मन भौंरा आ लपका..
3. मन उल्लू अँधा हुआ, चकाचौंध प्रकाश.
रतिमाया व्याध्र बना, शिकार पहुँचा पास..
4. एक भोग से दूजे पर, प्रतिक्षण परिवर्तन.
बन्दर की उछल कूद, पैशाचिक नर्तन..
5. घोर अतृप्ति का शिकार, जलत मन और प्राण.
जीवनी-शक्ति फूँक दी, शरीर बना श्मशान..
6. तीव्र वेदना पूर्ण, ऊपर से नकार.
जब भी कुरेदी गई, चिनगी लौ आकार..
7. झूठी अंहकार यह की, जीत लें सारी प्रकृति.
रति माया जब पटका, सुस्त हो गई बुद्धि..
8. बुद्धि पैनी बना लिया, घिस घिस चढाई सान.
कृपाण दो टूक हुआ, रति माया का बाण..
9. दिल में घाव लगी, बेहोश ना! मदहोश.
पूरा अस्तित्व हिल उठा, है! बड़ा अफसोस..
10. वो नरभक्षी बाघिन रतिमाया, मन को दी चीथ.
तब क्यों निज बुद्धि पैर, रखे भरोसा मीत..
11. निज नारी से ऊब चुका, निज नर से नारी.
मन भौंरा भ्रमण करे, हो स्वेच्छा-चारी..
12. स्वर्ग तक क्यों उडे?,उलझे नर व नारी.
गुरुत्व आकर्षण शक्ति ने, हराई जग सारी..
13. कुछ कुशलता अर्जित की, सीखा कुछ व्यवहार.
फूलों से ढंका मुर्दा, आत्म साधना नकार.
14. चले दूनिया को हिलाने, सुधरना नहीं मगर.
मन तनिक न हिला सके, जाती अपनी डगर..
15. निज जीवन ही सर्वस्व ? दूजे तो बिन प्राण?.
समाज को ही तोड़ दी, क्षणिक तृप्ति घ्राण ..
16. विवेक भावना श्रद्धा, हुई मूर्छा ग्रस्त.
काम क्रोध की प्रेत करें, जीवन भर संत्रस्त..
17. साकार श्मशान रूप, जीवन भर दुर्गति.
दुश्चिंता चिनगी जलत, निरंकुश साथी संतति..
18. बुद्धि से जग जीतन चलें, लेकिन घर में भयभीत.
गुलामी बजा बजाकर, चारों खाने चित..
19. कुछ लोगों के बन गए, पूर्णतया पराधीन.
समाज भाड़ में जाए !, बिल्कुल भावना हीन !..
20. दूजे से अन्याय क्यों?, भोगें छीनी सुख.
वासना पूर्ति में लगे, करके नीचे मुख..
21. जीवन में क्यों करत, लोभ मोह व शोषण?.
बहरे यह तो खेल न, चीखें मची भीषण..
22. बोझ से लदा रहा, घोड़ा गधा भांति.
माया समेटने को हुयी, वासना कब हो तृप्ति?..
23. शरीर बुड्ढा हो चला, ढोते ढोते भार.
पुत्रेष्णा की कोडा लगे, काम क्रोध सवार..
24. भवन चरमरा उठी, शहतीर में लगी घुन.
वासना कब पूरा करे, पड़े इस उधेड़बुन..
25. नाक बंद न हो जाए, दलदल में फंसकर.
कोशिश निकलने की करें, साधना डोर पकड़कर..
26. छद्म जरूरत पूर्ति में, चित्त अनवरत अशांत.
जीवन तब बन जाए, नाटक एक दुखांत ..
27. बर्हि-जगत सवारते, बीत चली श्वांस.
बुद्धि सार्थक बने जब, हो अन्तर-विकास..
28. आतंरिक अशुद्धि हो, सन्निपात ज्वर.
स्वाद बिल्कुल ना भासे, निकले कातर स्वर..
29. आत्मा प्रतिच्छाया, पड़ी वस्तुएं पास.
निजी कल्पना रंग दे, तभी सुखद भास..
30. वाह्य-जगत में तो नहीं, अन्दर है वो सुख.
अन्तर को संवार ले, सुख सागर सम्मुख..
31. पत्ते शाखा क्यों सींचे?, सींचना है तो जड़.
आत्म-सिंचन से होत, बुद्धि भाव सुगढ़..
32 साधना से भरता रहे, जीवन नाव का छेद.
तब समुन्दर पार करे, बुद्धि-पतवार समेत..
33. निज जीवन की साधना, शाश्वत की अनुभूति.
मानव महान बने बस, पालन कर यह नीति..
34. कर्तव्य करता रहे बस, आत्मा की परवाह.
मित्र प्रशंशा पा वो !,शाहों का भी शाह !..
35. दिव्य दृष्टि खुल उठे, अन्तर भावावेग.
गुरुकृपा की सुरमा, आनंद का उद्रेक..(Written by Sri Prakash [ sriprakash.rai@gmail.com ], 2004)
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