व्यक्तित्व
दर्पण ढंकी मैल से, कलुषित आत्म अनूप.
बिन सफाई दिखे न निज, वास्तविक स्वरूप..
इच्छायें निरंकुश हैं, निज की बीती शक्ति.
दूजे के सिर सवार हो, चाहें इच्छापूर्ति..
अंहकार तूफ़ान व, काम क्रोध तल्लीन.
तिनका जैसे उड़कर, भटके लक्ष्यविहीन..
छोड़ भरोसे दूजे, नहीं ठगाना आप.
बड़ी कीमत चुकानी व, भारी पश्चात्ताप..
मायाचार में ढंका, जमी पर्त दर पर्त..
नरक की आकर्षक सीढ़ी, ठेले पतन की गर्त..
नींव तो मजबूत कर, गहरी हो व्यक्तित्व.
दूसरे विश्वास करें, ऐसी हो अस्तित्व..
चिंतन-जल चरित्र-सीमेंट, भवन बना अब दृढ़.
व्यवहार-कंगूरा सजा, अद्भूत बने नींव..
प्रेम त्याग विवेक अब, इसमें करें निवास.
व्यक्तित्व सुवासित, जीवन हो मधुमास..(Written by Sri Prakash [ sriprakash.rai@gmail.com ], 2004)
Comments :
Send Comment