छद्म महानता

सोचा बड़ा महान है, व्यवस्थित सब ढंग.
भ्रम तब दूर हुआ जब, पाया नाजुक अंग..

रति खाई में है गिरा, दोलत का है भूखा.
अपना खून चाट रहा, चबा हड्डी सूखा..

जीवन लगभग बीत चली, सीख भोग का ढंग.
इन्द्रिय बेजान हुई, मन का गया ना रंग..

जीवन भर धरती रही, वासना कई रूप.
रति पैसा और अब, नामवरी अंधकूप..

साथी ने ही भोग ली, बेटे पैसे छीन,
जगत में धिक्कार पाते, हुये शरीर विहीन..

चले थे महान बनने, असत राह अख्तियार.
कब्र तो कुचलाती रही, उस पर चढ़े सियार..

कामिनी कंचन लुभाती, उपलब्धि पर न तोष.
खाई चौडी कर रहा, गवां करके होश..

द्वेष सर्वथा त्याग कर, हुआ आनंदमस्त .
गायत्री ऐसे भक्त को, देती रही समस्त..

निर्बाध गति से चला दे, सह जाऊं सब कष्ट.
हजार चोट भी ना करें, निज को पथ भ्रष्ट..


निजत्व में स्थिर कर दे, कुसंस्कार पर चोट.
घाव मवाद से तना, निकले अहम् की खोट..

कष्टों में दर्शन तेरी, बना रहूँ सत्पात्र.
चाहे तो सब छीन ले, छोड़ के भक्ति मात्र..

गायत्री तू हरती रहे, ऐसे ही मन भ्रान्ति.
बड़े नफे का सौदा यह, तुच्छ कष्ट बड़ प्राप्ति..

        (Written by Sri Prakash [ sriprakash.rai@gmail.com ], 2004)

      

                                                  

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