दावानल व्याप्त है, अभी तो मुंह मोड़.
जंगल राह में भटका, असत्य रास्ता छोड़..
जंजीर कस जकड पड़ी, अकडी गई शरीर.
सत्य ही कल्याणी है, पावे मस्त फकीर..
शुभ सत्य की डगर है, चल सकता बस वीर.
देत मुक्ति आनंद-युक्त, असत्य राह जंजीर..
कठिनता से सत ऊपजे, रखवाली कर यार.
अभ्यास से सिंचित कर, अनमोल पैदावार..
काफी गवां तू चुका, और नहीं कर नष्ट.
समझ महत्व अमोल का, न पा करके कष्टथक कर चूर था जब तक, लगाता रहा दौड़.
राह सत्य जाना तभी, दी सब गुरु पर छोड़..
(Written by Sri Prakash [ sriprakash.rai@gmail.com ], 2004)
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