सांसारिक

कुटिल माया युगों से, चले शतरंजी चाल.
उसकी यह प्रवृति है, मत बनना बेहाल..

शतरंजी चाल में नहीं, राजमार्ग को तज.
जीवन कोई खेल ना, यह अमोल ना रज..

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गायत्री जप कर उतार, अवांक्षित खुमारी.
आत्म-उत्थान कर ले, मन पर करके सवारी..

मनुजता विकसित करे, वजनदार व्यक्तित्व.
निज गौरव पहचान कर, मन पर स्वामित्व..

दूजों को भी राहत,निज का भी कल्याण.
आत्म-सफाई के बिना, न पाया कोई त्राण..

गायत्री माँ दया करे, सबको छोड़े भूत.
आत्म-तत्त्व में स्थिर हो, मन को कर अभिभूत..

गले तक ठूस लिया, अभक्ष्य अशुभ विचार.
कुपथ्य विष उत्पादक यह, रह रह देत डकार..

जहर तन में फैल गई, रक्त हुई दूषित
घाव मवाद दुर्गन्ध बन, घिनौना व्यक्तित्व..

गायत्री जप से उठे, सद्विचार सत्संकल्प.
असंख्य रोगों की दवा यह, आत्मिक कायाकल्प..

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जग तोड़ना चाहेगी, लुभा विभिन्न प्रकार.
अपमानित न होना तू, राह-छीन संसार..

पात्रता दिखाए बिना, मत बनना तू घनिष्ट.
मुझे तेरी न जरूरत, अब मैं आत्मनिष्ठ..

कुटिल वाणी भी सुनि कर, निज मन दुःख न होय.
निज मन में मस्ती रखो, सनकी सबकें पाय..

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दिखावा अब बेकार है, चित्त बेतार का तार.
वेष बदलने से नहीं, होता शेर सियार..

कई चेहरे दिखा दिए, माया बदला रूप.
नौटंकी बेकार है, दर्शक गया अब ऊब..

जगत कुटिलता देख कर, होत क्यों भयभीत.
हमेशा सत सलाह मिले, गुरु ही सच्चा मीत..

जगत दुःख देता रहा, सत् सुख दे करतार.
प्रभु पीड़ा तार दे, संसार सुख असार..

ठोकर खा खा थक चुका, दुःख का पारावार !.
समझा असली अब कारण, जाकर गुरु के द्वार..

गायत्री माँ करा देत, सद्वृति प्रादुर्भाव.
निष्ठा तो बढ़ जाती, कुचेष्टा का अभाव..

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बड़ बोली बड़ लुभावन, अम्बर के सब फूल.
सब खाक सबसे बड़ी, गुरु चरणों की धूल..

दुनिया देगी चीज जो,स्वतः नष्ट हो जाय!
पर उससे भी पहले, तुझे नष्ट कर जाय!!

देना तो बहाना है, ठगना तेरी चाह!
मैं अपनी राह चला , जा तू अपनी राह..

अपराध बोध ना हमें, ठगाते बारम्बार!
भीतर झाँक कर पा ले, साधनों के अम्बार!!


बुद्धि दोषयुक्त बन पड़ी, छल दंभ सरंजाम.
तब उलझ निष्क्रिय पड़ी, सत्कर्म का इंतकाम..

साधकों को महसूस निज, बुद्धि का चमत्कार.
साधना से बुद्धि निर्दोष जब, नित्य नूतन विचार..

योजना ठीक बनाता, धैर्य रखे अपार.
कितना कब कैसें चलें, करता रहे विचार..

चलत चलत छाले पड़े, मंजिल अब भी दूर.
उलटी दिशा में घूम कर, क्यों कोसे भरपूर..

साधना ना होने देत, चित्त को डावांडोल.
बच्चों के खिलवाड़ सम, प्रदर्शन बड़बोल..

जोरशोर उठने लगी, काम क्रोध तूफान.
गुरु कृपा वृष्टि की, हुयी विपत्ति अवसान..
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थमा कर जीवन डोरी, अब क्यों पछताय.
कुटिल जग तुझे दे पटका, बिलख के छटपटाय..

अचूक लगाये लंगडी, गहरे खड्ड गिराय.
गिरा कर भी ना चुके, दो चार लात लगाय..

दो चार लात लगा कर, मिट्टी से दी ढँक.
मिट्टी से मिट्टी मिला, क्या राजा या रंक..

पंख काट कमर तोडी, जग फिर भी दे त्रास.
मन पछी बना घायल, काल बनाता ग्रास..

बीती पर मत खिन्न हो, मन मत ला प्रसंग.
स्मृतियाँ शुभ क्षणों की, आशा अपनी अंग..

हमें दुनिया की ना फिकर, बंधी है गुरु डोर.
भवसमुद्र घुसने चला, रस्सी कभी न छोड़..

परिस्थितियां भारी पड़ीं, बुद्धि हो गई शिथिल.
आह्वान गायत्री का, दूर करे मुश्किल..

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        (Written by Sri Prakash [ sriprakash.rai@gmail.com ], 2004)

      

                                                  

Comments :

pypeStity wrote...
Many thanks.


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