दिव्य आतंरिक-लोकों की यात्रा व उनमें निवास

दर्शन करनी है तो, दिव्य आतंरिक लोकों का दर्शन कर
यही वास्तविक तृप्ति का, एक मात्र साधन है

दिव्य लोकों का भ्रमण, कराती है आत्म साधना
आत्म-रस से तृप्ति मिलती, मद-मस्त हो मन रसना
जन्म भर की प्यास मिटाती, और जीवन प्राण बढाती
मरुस्थल में तृप्ति की आशा, ग़लत दृष्टिकोण है

मरुस्थल में मृग दम तोडे, पानी पीने की है चाहत
दौड़ थकान और माया भ्रम, प्रतिक्षण अनुचित अकुलाहट
कल्पना की दौड़ है, आत्मा की ही ओर उचित
हरियाली को छोड़ मन, मरुस्थल में घुमाता है

मरुस्थल में भटकता रहे, मृग पीने को पानी
मानवीय गरिमा सबसे बड़ी, यह दिव्य लोक का प्राणी
आत्म-उत्थान में ही पाता, वो शाश्वत तृप्ति का लोक
दृष्टिकोण ग़लत तो, भटकना ही परिणाम है

ऐसे लोकों में भ्रमण कर मन ! जिसमें भागवद् कृपा वृष्टि
आत्मा उपजाऊँ तब, रिद्धियाँ सिद्धियाँ इसमें उगतीं
ये लोक बाहर नहीं, है उच्च स्थिति निज मन की
साधना की निराई गुडाई से, आत्मा उपजाऊँ बनती है

मन मोहक चमक युक्त होती, भोगवाद की ताप
जलते शरीर मन, वासना की आंच
आत्मा तो कराहती इस तुच्छ वातावरण में
झुलस झुलस कर इसी मरू-भूमि, में दफ़न होना है

लाख सुखोपयोग सामग्री भी, तृप्ति प्रदान करें नहीं
मन ही बिगड़ गया तो, सर्वत्र असंतुष्टि भासती रही
पा उसको, जिस पर करोणों टन हीरे भी दाँव चढें
बालू बटोरकर बुद्धिमानी समझना ग़लत है

आत्म जल की चाह तो, मरुस्थल में क्यों आकर्षण ?
निम्न मानसिक लोक में होती, आत्म मर्यादा मर्दन
बेचारा बालू बटोरता रहा, निज गौरव भूलने लगा
तुच्छ भोगों के लालच में, निज स्थल त्याग ग़लत है

अधोगामी बना जब, उतरा निम्न मानसिक स्तर पर
भोगों के चकाचौंध में, अँधा विवेक खोकर
लोभ मोह वासना, की पैशाचिक नृत्य होती
विलासी प्रवृति में, जीवन मूल्यों की होली जलती है

तुच्छ का गुलाम बना, चाटे वो जूठी पत्तल
नीचता अपना लिया, विलगित होता आत्म-स्थल
उच्च मनोभूमि में ही, जीवन सत्यों की झलक मिलती
जिसको अपनाकर ही मानवता निहाल होती है

भोगवादी प्रवृतियां निरंकुश, नंगी नृत्य जी तोड़
आत्मा सौन्दर्य अविकसित, मुर्दे को सजाने की होड़
कुत्सित कामुकता को भड़काए जो कला, वो तो
इसी, निम्न मानसिक धरातल पर ही फलती फूलती है

निम्न मानसिक स्थिति पर, होती अपसंस्कृति वर्धन
पिता-पुत्र और दाम्पत्य, संबंधों का व्यवसायीकरण
समाज की ईकाई , जो परिवार संस्था है न्यारी
वही विकृत हो रही, जो प्रारंभिक संस्कारशाला है

निज गौरव को पहचान कर ही , हो सकता कल्याण
अँधा-अनुकरण दासत्व ये, आत्म हीनता की पहचान
उच्च मानसिक लोकों में ही, निज मर्यादा की अनुभूति
निम्न मनः-स्थिति तो बस एक छलावा है

आत्म-अनुकूल दृष्टि जब , मन कल्पना हो परिष्कृत
कण-कण भासे आनंद-स्रोत, पूर्ण आत्म संतुष्टि
इन्द्रिय चक्र में भ्रमण से मिले, दुःख से सना ही सुख
आत्म-क्षेत्र का निवासी तो, भव चक्करों से स्वतंत्र है

असली तृप्ति दिला सकती, आत्म-श्रेष्ठता का निर्झर
चिंतन चरित्र के कसौटी पर,खरा उतरकर
स्वर्ग सम सुंदर भासती तब,निज आत्म-क्षेत्र प्यारी
आनंदोल्लास युक्त ऊँच्चा ,भाव-भूमि में प्रतिष्ठित है

रहें ऐसे मनो- भूमि में, जिसमें ऋषि निवास करते,
वही मनः-स्थिति उचित, जो स्थायी फल है देते
भाव संवेदना को चरम स्थिति में पहुंचाए और
समग्रता प्रदान करे, वह यही आत्म-लोक है

"वसुधैव-कुटुम्बकम " व "विश्व-बंधुत्व" की भावना उचित
पर निज संस्कृति मूल्यों को, खोना बिल्कुल अनुचित
दर्शन करनी है तो,दिव्य आतंरिक लोकों के दर्शन कर,
यही "आत्मवत -सर्वभूतेषु", भावना का मूल है

 

(Written by Sri Prakash [ sriprakash.rai@gmail.com ], 2004)

      

                                                  

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