तुम्हें कोटि प्रणाम

गुरु अवतारी सत्ता हैं, मानव तन धर आए
ज्ञान चक्षु खोले शिष्यों के, गायत्री सुलभ बनाए
हाहाकार फैली थी जग में, चहुँ ओर थी मारामारी
देश गुलाम था और नवयुवकों पर चढी खुमारी
खपाया उनने निज को , देशभक्ति के काम
हे युग नायक , हे युग ऋषि , तुम्हें कोटि प्रणाम

ऋषि चेतना , सूक्ष्म रूप धर , पूजा कक्ष में आए
मानव गरिमा को समझा, ऋषियों के अनुग्रह पाए
कैसे रुक सकती थी उनके, संकल्प की प्रखर गोली
लक्ष्य से जा मिला और सुनी दुनिया वह बोली
याद करेगी पीढियां उनके, कृत्यों को सुबह शाम
हे युग नायक , हे युग ऋषि , तुम्हें कोटि प्रणाम

चौबीस साल तपे, कष्ट सहे, खाए जौ की रोटी
उग्र तपश्चर्या के बिना क्या, जगत कल्याण होती ?
मनुजता निहाल हुई जो, थी विवश खायी मार
साहित्यों से पिला दिया हमें वेदों का सत्व सार
पाखंडियों के भूलभुलैयों में, नहीं सही अंजाम
नहीं पा सकते मोक्ष, बिना युगधर्म सत्काम
तथ्य खुलासा किया, यह निर्देश सबके नाम
हे युग नायक , हे युग ऋषि , तुम्हें कोटि प्रणाम

बस वरदो हे देव की हम आपके पथ पर चलते जाएँ
गायत्री और गरिमामय यज्ञ को घर घर में पहुंचाएं
वीर जगें, मानवता विकसे, धर्म ध्वजा फहराए
और धरती पर स्वर्ग का, अवतरण सहज हो जाए
तुम्हारे विचार सक्षम हैं, तारने को सकल जहान
प्रज्ञा आलोक चहुँ ओर फैले, और सुन लें सबके कान
वे मानव तनधारी नहीं, वे तो शक्ति स्रोत अविराम
हे युग नायक , हे युग ऋषि , तुम्हें कोटि प्रणाम

(Written by Sri Prakash [ sriprakash.rai@gmail.com ] for Gayatri Shaktipeeth , Harbanshpur, Azamgarh, May-1996)

      

                                                  

Comments :

pypeStity wrote...
thanks


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