भोगवादी समाज

तपन व्याप्त है आज समाज में, विभीषिका लाया भोगवादी विज्ञान
अर्धप्राण मानव भरे पड़े, समाज बन गया एक श्मशान
चीख सुनाई दे रहे निर्बलों के, श्रृंगालों की हुआं हुआं
भयपूर्ण वातावरण है संव्याप्त, आता नही समझ में निदाँ
भौतिकता में उन्मत्त लोग, कुत्तों जैसे हैं लगते
हड्डियां चबा रहे निर्बलों के, क्या कुछ लहू पी पाते ?
रक्तरंजित जीभ उनकी भोगदेव, स्वाद क्या होती है व्यक्त ?
संवेदना मर गई, नीरस हड्डियां, ख़ुद वे पी रहे अपना ही रक्त
भोगवाद बन गया पुरोहित, हवस रूप में फैले यजमान
निर्बलों का रक्त बन गया बलि सामग्री, हाहाकार उठती लौ समान
आसुरी यज्ञ की उर्जा फ़ैल रही जग में, ढ़ा रही समाज में कहर
मानव मन में दुष्प्रवृति वर्धन करती, आतंक वर्षा लहू की नहर
बीहड़ कष्टकर समाज बना, ठूंठ हो गए फलदायी वृक्ष
जगतीतल तप रही है ऊपर लू, कहाँ शान्ति ? भयावन दृश्य
श्रृंगालों की वाणी विचित्र, डरावनी मुद्रा में भेड़ियों की धमकी
कहने को साथी पर कहाँ विश्वसनीय ? खैर नहीं अब निर्बल की
माया रुपी विचित्र मृगतृष्णा, लूटने की आपाधापी और होड़
मन प्यासा हिरन एक दौड़ता, प्यासा ही देता दम तोड़
साम्राज्य फैला गिद्धों का, ठूंठे वृक्ष बने उनके सिंहासन
मांस नोचते, छीनते, झपटते, काटते दूजे को, दो के बीच तीव्र जलन
गिद्ध कौओं की मिली भगत, खीच रहे मिल लम्बी आंते
मौका मिले तो कौआ ले भागे, क्या जरूरत की वह बांटे
नरपशुओं का बाहुल्य समाज में, पाश्चात्य संस्कृति फ़ैल रही अजीब
अश्लीलता फैलाती फिल्मी गाने, हुआं हुआं कर रहे नरपशु जीव
दामिनी की तडित बड़ी घातक, विकलाया निकला शिशु तोते का
चील कौओं का साम्राज्य, रंग गया गात थोड़े पल में उसका
मनुजता बेचारी है विवश, खायी पटका पटका कर मार
अर्धमृत हो गई, भौतिकता चिता, दौड़ती चिता को बारम्बार
समाज बना कंकालों का ढेर, प्राणहीन मन,  कृशकाय
नरपिशाच ऐसे लगते, जैसे सड़ी और फूली लाश
चकवा भोला तड़प रहा, लगी उसे बहेलिये की तीर
चकवी जा छिपी झाडी में, क्रंदन करती नेत्रों में भर नीर
राष्ट्र बेचारा हुआ कमजोर, उस पर हावी हैं शैतान
जीभ निकाले लेटे पड़ा है, शरीर पर कोड़ों कें निशान
 

 आध्यात्मिक समाज


ब्रह्म सरोवरों का जल कितना निर्मल, खिलते कितने पुष्प सरोज !
पुष्परूप ये सद्-वृतियाँ हैं, करता मन रहस्य की खोज
स्वच्छ नीर जैसे हो दर्पण, झलकें दिखतीं निज मन, आत्म, शरीर
तवज्जह करती होती प्रतीत, आंदोलित तन, विचार क्रान्ति का समीर
रे मन ! क्यों डरता है ? छूओ गहराइयाँ, क्यों चल रहा है तीर ?
सत्साहस सफलता दिलाती, क्या नहीं हैं गुरु श्रीराम नजीर
लहरें चाहतीं आरूढ़ होना नीरज पल्लव पर, उसपर भौरों की गुंजार
ऊपर नील-निलय नीचे नीर, ललितमय ब्रह्मसरोवर संसार
ऐ भोगवाद से ताप त्रस्त तन, तापस्रोत है मद, क्रोध और काम
शीतल विचार , सद्-वृतियाँ सुरभि, ब्रह्मसरोवर हैं गुरु श्रीराम
निर्निमेष नेत्रें निहारतीं नीर में, अरुण का बिम्ब
गुरु-ह्रदय में परमात्म चेतन दर्शन, गुरु गोविन्द अद्वैत, नहीं भिन्न
रश्मि तुलिका सविता स्रोत, बहती पवन, कागज़ तरंग
लिखती कुछ अबूझ भाषा में, उत्पन्न करती मानसिक उमंग
सहृदय साधक खोज रहा मूक भाव से, कुछ रहस्य होती प्रतीत
सरोवर के तीरे भ्रमण कर रहा, त्यागना चाहता तापित अतीत
ब्रह्मसरोवर एक पूर्ण संसार, आवश्यक दृष्टियों का उचित कोण
दिखें परछाईं इसमें आत्मा की, घूमें यदि इसके चारों ओर
परिजन रुपी राजहंस विचरण करते, कर रहे क्रीडा कल्लोल
जब ये चलते नीर पृष्ठ पर, लगतीं लहरें कितनी लोल !
जब उतरते ब्रह्मसरोवर में, अंतरात्मा की बधाई जैसे
रश्मिरंजित बूंदे सादर समर्पित , हरित सुकोमल पल्लव थाल से
पंख उठाते- सद्-भावों में होड़ लगाते, ब्रह्मसरोवर में तैरते
लगता शांतिकुंज नंदन वन से आयें हैं, निहारते नहीं नेत्रें थकते
मनोरम उपवन फैलें हुये हैं, इस ताल के चहुँ ओर
पिक सुआ मैना चटका को, देख नाचता है मन मोर
खगकुल साम्राज्य कितना प्यारा, कितनी प्यारी कोयल की कूक !
खोएं इसी ब्रह्मसरोवर में, रह रह उठती ऐसी हूक

      

(Written by Sri Prakash [ sriprakash.rai@gmail.com ] for Gayatri Shaktipeeth , Harbanshpur, Azamgarh, May-1996)

                                                  

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