प्रज्ञावतरण

क्या नहीं होता क्षुब्ध देख प्रकृति पुत्रों को -
कुपोषण, कुसंस्कार, अशिक्षा - अन्धकार में देखकर रे मन !
क्या नहीं दे सकते हम उनको आश्वासन
कैसे प्राप्त कर सकते मोक्ष, लगा ध्यान, बस बैठ अपने आसन ?
वर दो कि जब तक शरीर रहे हे भगवन
उठाएं उनको उस स्थिति से निज प्राण पण
नहीं चाहता मनोविनोद या किसी दर्शन का रसास्वादन
क्योंकि हमारे गुरु में ही हैं कबीर, चैतन्य
दादू, मीरा, सहजो, बल्लभ, रामानुज महामन
शंकर, विट्टल, रामदास, रामकृष्ण व विवेकानंद
वेद, संहिता, ब्रह्मण, आरण्यक , आगम निगम या पुराण
नहीं चाहता अवेस्ता, लाओत्से , त्रिपिटक, बाइबल या कुरान
सब तारें हैं शशिरूप है. निज गुरु के ज्ञान

      

(Written by Sri Prakash [ sriprakash.rai@gmail.com ] for Gayatri Shaktipeeth , Harbanshpur, Azamgarh, May-1996)

                                                  

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