मनुष्य और भगवान्

हे भगवन ! मनुज की यह क्या सत्ता
महाकाश का बिन्दु मात्र, ग्रह नक्षत्रों के सामने नहीं अता-पता
बनता जलधि जब जल की बूंदे करतीं हैं संयोग
अकेले में तो है वह सब प्रकार से अयोग्य
बिन्दु-वसुन्ध और बूँद-समुद्र में होती है अन्तर जैसी
नाममात्र आनंद, ताप युक्त, इस मानव और ईश में वैसी ही
क्षणिक सुख तब फिर पता नहीं, क्यों छा जता है तम
कुछ शारीरिक सुख तनाव युक्त, मात्रा होती है कम
मनुष्य की उपस्थिति, एक गंभीर व्याख्या, मात्र स्थूल शरीर नहीं उसे जान
वह है आत्मा, सुक्ष्म, कारण शरीर युक्त, एक घटक सर्वशक्तिमान
महान है वह, अतुलनीय है उस सर्वव्यापी का गुण
नहीं फूल जाता तब क्यों, उसमें आवे विषाद का अवगुण
वह सर्वरूप , सर्व शक्तिमान
हम घटक, वह सत्ता महान

      

(Written by Sri Prakash [ sriprakash.rai@gmail.com ] for Gayatri Shaktipeeth , Harbanshpur, Azamgarh, May-1996)

                                                  

Comments :

Ravi Kumar wrote...
Jai SriRam


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