नव-ज्योति

आनंद प्राप्ति की अभिलाषा में, मानव भटका पगडंडियों पर
उबड़-खाबड़ पथ पर चल रहा, संस्कृति का राजमार्ग भूलकर
चंचल चित्त, उद्विग्न ह्रदय, लिए मन में गहन अवसाद
निराशा रूदन ही मिलता, मुश्किल होता सुख का प्रसाद
भवजाल में फंसता जा रहा, सत्मार्ग न सूझे जग कोलाहल में
झुलस-झुलस कर तड़प रहा है, भोगवाद के दावानल में
देशप्रेम और त्याग की भावना , होती जा रही विस्मृत
पुरखों का आदर्श भूला, मन पर शासन करती अपसंस्कृति
साधन सिद्धि बन गए, बढ़ा साधन से सुख की आस
उलटी कदम दूरी बढाए, जाना भी चाहे यदि लक्ष्य के पास
भौतिक साधन बस साधन हैं, न ही महत्ता है इनकी अल्प
पर मानव मूल्यों के अधीन ही हो, कर सकते धरती का कायाकल्प
विवेक का हो शासन साधन पर, यह तो है दुधारी तलवार
यदि वह बन्दर के हाथ लगी, तो हो न क्यों निर्दोषों पर वार
समाधान मिल सकता मानव को, देव संस्कृति के सूत्र अपनाकर
छल दंभ पाखण्ड झूठ और मायाचार का भूत भगाकर
निस्वार्थ प्रेम, त्यागनिष्ठा लाएगी, नवजीवन और नवज्योति की लाली
सद्-भावों के पुष्प खिलेंगे, संस्कृति मूल्यों की फैलेगी हरियाली

 

      

(Written by Sri Prakash [ sriprakash.rai@gmail.com ], November- 2000)

                                                  

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