प्रकृति से सीख
यह प्रकृति समुद्र समान है, अथाह ज्ञान का यह सागर
मात्र कुछ अंश को पाकर, नहीं कर सकते रहस्य उजागर
बच्चे को प्रयास रत देख ज्यों, पिता समान बनकर उदारमत्ति
जैसे प्रोत्साहित कर कर के, ईश्वर करता खेल नित्यप्रति
आह्लादित होता शिशु देख, पूर्ण चाँद की परछाई
आकर्षित इस भावुक ह्रदय को, उसे पाने की व्याकुलता छाई
पर अफ़सोस ! यह वास्तविक नहीं, जल का चंदा है प्रतिच्छाया
सच्चा लक्ष्य तो उच्च स्थिति है, यह हो बस एक माया
ऐसे ही अज्ञान- पूर्ण मनुष्य इस, स्वप्न समान प्रतिभासित जग में
मायाबद्ध हो प्रपंच करता फिरता, मिलने को उस शाश्वत आनंद में
चाँदनी रात्रि विक्षेपित जल के सरोवर में, अनेकों चाँद के होतें है दर्शन
जैसे ईश्वर शिशु बन खिलवाड़ कर रहा, कहता होकर चंचल प्रतिक्षण
एक ही हूँ मैं, दर्शन कर सकते तुम, यह प्रकृति है मेरा विविध रूप
जीव, निर्जीव , जंगम, स्थावर, सभी हैं मेरे आत्म स्वरुप
मैं बिखरा पड़ा हूँ, इस प्रकृति के घट घट में
आँखें खोलो तंद्रा मुक्त हो, सीख लो जड़ और चेतन से
कल कल करती नदी है बहती, आशा और उत्साह लिए प्रचुर
प्रेमी सागर से मिलने को, प्रतिपल है उत्सुक और आतुर
चट्टानों से खेलती आगे बढती , रुके न नदी के जल की धारा
मिलन का दिन तो आना ही है, सच्चा लगनशील कभी न हारा
गले मिलतें दिखतें हैं बादल, पर्वत के उच्चे शिखरों से
विशाल ह्रदय यह लगता जैसे, शीश उठाए हो आत्म गौरव से
मूक वाणी में बोल रहा, प्यारे ! धरती पर रहना तुम ऐसे-
आदर्श अडिग, मन समर्पित और मस्तिष्क , परिपूर्ण हो उच्चे आदर्शों से
उन्मुक्त विचरण करता पवन, यह चिर प्रवाहिनी चिर निरंतर
जीवन दायिनी शक्ति समर्थ यह, शिक्षित कर सकता मानव के अन्तर
चलते रहना बस परहित में, यही धर्म है उसका पावन
अशिक्षित, असमर्थों के तप्त हृदयों को, ज्ञान-पवन से देता नवजीवन
राष्ट्र रुपी पावन वृक्ष के, मुर्च्क्षित मुरझाये पुष्प पल्लवों में
हे मेरे अस्तित्व के स्वामी ! संचेतन संचारित कर मुझे होम दे
अनंत की ओर यात्रा करतीं हैं, सुंदर चंचल लहरें सागर के
कौन जाने क्या क्या रखा है , इसके विस्तृत वक्ष-स्थल के नीचे
शांतचित्त विशाल ह्रदय युक्त, यह है गंभीरता की प्रतिमूर्ति
मणि-माणिक्य जवाहरात खनिजों की , यह करता है आपूर्ति
देते रहना ही धर्म है सागर का, याचना की प्रवृति से है यह मुक्त
मानव मन की शिक्षित कर सकता, एक उदाहरण यह चिर उपयुक्त
अंहकार वासनाओं में जकडे हम सब, लोभ मोह बन गए अपने साथी
भावनाएं संकीर्ण, कल्पनाएँ दूषित, कोई कुकर्म रहा न बाकी
माया पट्टी खोल करके करके हम , कर सकते परमात्म चेतन के दर्शन
प्रकृति के घटक भी हमको, करा सकते सत्य का अवलोकन(Written by Sri Prakash [ sriprakash.rai@gmail.com ], November -2001)
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