विज्ञान - सुख सरोवर , सुखसागर है अध्यात्म
कहता विज्ञान कि ...
क्या नहीं पता कि विदेशों में
कैसे कैसे हो रहे अन्वेषण
क्या बाकी रहा गया विज्ञान से ?
जीव, ग्रह, नक्षत्र या भूतल
तथ्यों पर आधारित विज्ञान
तो तुंरत फलदायी है
पर तर्कशील कैसे मान ले ?
सत्य परम हितकारी है
कारण, जिज्ञासा, परिकल्पना, पर्यवेक्षण
तब ही आती है निष्कर्ष
कैसे कैसे चमत्कार हो रहे !
और मानव जीवन में उत्कर्ष !
दोहा - भौतिक सुख यातायात, असाध्य रोग निदान |
सभी सुविधा विज्ञान से, बहुजन हिताय विज्ञान || 1
मैं फिर उससे पूछा कि ----
ऐ बंधु क्या ये सभी साधन
करती सिद्ध उत्कृष्टता भौतिक शास्त्र ?
क्या नहीं थे अपने देश में पहले
चरक, धन्वन्तरी, दिव्यौषधि , ब्रह्मास्त्र ?
क्या जड़ विज्ञान का हौसला रह सकता
इसी तरह बुलंदियों कि ओर ?
क्यों अनेकों पाश्चात्य वैज्ञानिकों कि खोजें
अब हो रही चेतन जगत को ओर
मैं फिर उससे पूछा कि क्या
मौलिक कणों को किसी ने देखा ?
जिस वस्तु पर कड़ी जड़ - जगत परिकल्पनाएं
क्या वही है सही रूपरेखा ?
इलेक्ट्रानों कि द्वैती (= dual) चरित्र है
कभी कण तो कभी तरंगों में
कोई सिद्धांत कणों से सत्य कोई इसे तरंग मान
एकरूपता नहीं जड़ सिद्धांतों में
ये सब सिद्धांत नहीं है प्रथम
न ही मौलिक अन्वेषण
मात्र करतीं ये सब वेदों के
कई सिद्धांतों का समर्थन
दोहा - परमात्मा ही है मूल, नहीं कण मौलिक |
जड़ नहीं चेतना ही, वस्तु है अलौकिक || 2
क्या विज्ञान निर्मित कोई यन्त्र
जिसमें हो माता जैसा प्रेम विचार ?
गायत्री मंत्र कैसी विलक्षण !
साधक अनुभव करता नित प्यार
क्या रोबोट में होती संवेदना
अचेतन का चेतन से कम महत्व
यह नहीं पोंक्ष सकता रोतों के आंसू
न ही दिखा सकता अपनत्व
जड़ अन्वेषण में एकरूपता नहीं
अन्वेषण का अपूर्ण आधार
जिन सिद्धांतों पर खड़ी विज्ञान ईमारत
बनती बिगड़ती रही है बार बार
फिर विचित्र प्रतिपादन तथ्यों की
यह तो है दोगली नीति !
सब प्रतिपादन में मूल वस्तु भूल गए
वो तो अद्वितीय चेतन शक्ति
गुरु भी कहा करते थे
भविष्य में होगा कोई विज्ञान
तो वह अध्यात्म विज्ञान ही
सभी अंश , पूर्ण यह ज्ञान
सभी नदियाँ दौड़तीं सागर को
सागर होता अंतिम पड़ाव
जड़ खोजें पहुंचती चेतन की ओर
तभी स्पष्टता अन्यथा अभाव
चेतन शक्ति को मान सत्य बस
नहीं पूछना ऐसा क्यों
वैसे जैसे वैज्ञानिक परिकल्पनाएं
अन्वेषण के पहले ज्योंइस समय माया क्षेत्र में हैं
जड़ नहीं पकडे मायातीत बातें
माया के बहार जाने के लिए
चाहिए कई घात प्रतिघातें
माँ गायत्री का अंचल पकडे रहें
माँ बहुत करुणामयी स्वजन
घाव दोषों से मुक्त कराती
जन्मदात्री माँ भी करा ऑपरेशन !
दोहा - भौतिक, जीव, रसायन, व वनस्पति विज्ञान |
सब दीपक पर सूर्य है, आध्यात्मिक ज्ञान || 3
डी ब्रोगली के सिद्धांत से होता
वैदिक ज्ञान का स्पष्टीकरण
यह खोज भी है वस्तु के
चेतनशीलता का प्रमाणीकरण
सभी पेड़ पौधे पर्वतादि जद
करते नियत आवृति ( frequency) से दोलन ( rotation )
सभी की है नियत फ्रीक्वेंसी
सबमें विद्यमान है चेतन !
ध्वनियों में विभेद करने के लिए
हैं ये फ्रीक्वेंसी सहायक
इसकी सीमा शून्य से अनंत तक
मानव पकड़ बस बीस हज़ार तक !
कुत्तों, चमगादड़ को कुछ ज्यादे सुलभ
उनको हमसे है अधिक दायरे का भान
कुत्ते का सूंघ पता लगाना आश्चर्य
करती आश्चर्य फ्रीक्वेंसी का ज्ञान
गायत्री मंत्र के नियत ले से
होती उत्पन्न इन्द्रियातीत तरंग
कितनी अनुभूतियाँ उत्पन्न होतीं !
साधक पाता नित नित उमंग
अल्ट्रासोनिक आदि फ्रीक्वेंसी से
कर लेता विज्ञान कुछ काज
बैखरी, परा, पश्यन्ति वाणियों पर
क्यों नहीं भारत को नाज़ !
कान हैं माया से बंधे
पर ह्रदय का है क्षेत्र विशाल
मायातीत हों पहले तब देखें
अनहद फ्रीक्वेंसी का कमालमानव वाणी की फ्रीक्वेंसी सीमित
अतः अनुभूतियाँ है वर्णनातीत
पर ह्रदय का तो क्षेत्र विशाल है
अनुभूति जन्य , असंभव कथित
दोहा - कुशल योद्धा व रथें, दिव्य धनुष व वाण |
उत्तम मंत्र साधनाएं, नहीं मात्र संधान || 4
फिर पूछता विज्ञान कि ----------
नहीं समझ में आता कि क्यों
गायत्री मंत्र पर देते तुम जोड़
क्यों है इसका इतना महत्व
क्यों इसकी वैज्ञानिकता बेजोड़ ?
मैं फिर उससे बोला कि ------
सैनिकों को नहीं चलने दिया जाता
एक ही लय से पूलों पर
और बर्तन खनखनाने लगते
चलती रेलगाडी यदि दूरी पर
धरती व पूल बहुत वजनी हैं
नहीं हिलें थोड़े शक्तियों से
ध्वनि के लय ताल की शक्ति है
विज्ञान सिद्ध कई युक्तियों से
सब आयुध प्राकृतिक शक्तियों का अन्वेषण
और उनका दिव्य समंजन
अध्यात्म समुद्र , विज्ञान सरोवर
गायत्री मंत्र एक महान अवलंबन !!
ध्वनि की शक्ति है बहुत बड़ी
बहुत महान है मंत्र गायत्री
शब्दों की गुंथन है अद्भूत
वेदादि समस्त जगत ज्ञान जन्मदात्री
मात्र स्वर नहीं पहुँच सकते
चाहिए साधन, ह्रदय की उपयुक्त भाव तरंग ( waves)
बल्ब तभी जल सकती जब
तार और विद्युत का हो संग
गायत्री से प्रसूत तरंग ( waves) की
आकृति है कुछ चक्राकार
उर्ध्वगमन करती सूर्यमंडल को
लौटती ले अनुपम उपहारजीव विज्ञान बोलती मानव में
अमाशय , अड्रिनल इत्यादि ग्रंथियां
मूलाधार, अन्नमय , मनोमय को
मानती है वह भ्रांतियां
कोश, ग्रंथि, उपत्ययिका , नाडियाँ
आदि चीजें हैं सुक्ष्म आध्यात्मिक
सत्य का सम्बन्ध अनुभूति से
तथ्यों का सम्बन्ध है भौतिक
श्रवण अतीत स्वरों की पहुँच
है इन अदृश्य वस्तुयों में
गायत्री उत्पन्न करतीं तरंग (waves)
जो पहुंचती इन ग्रंथियों में
विश्व ब्रह्माण्ड में है जो विद्यमान
उसकी है मानव शरीर अनुकृति
अध्यात्म से चमत्कारी परिणाम
अपना साधना, सुचिन्तन वृति
छद्म वेशी के मीठी बोली से
उत्पन्न कुछ ऐसी तरंग
कर्ण प्रिय पर ह्रदय वेधी वह
नहीं जाता शिशु उसके अंक
स्वर का क्षेत्र बहुत विस्तृत है
अद्भूत है इसकी नज़ारा
शिव, प्रभावकारी, कुटिल, कर्कश
वीभत्स और अश्लील आकारा
सबकी विचित्र हृदयगोचर फ्रीक्वेंसी है
वाणी असंयम से व्यर्थ जीवन सारा
विज्ञान नहीं समझा संयम को
हम लें गायत्री मंत्र का दृढ सहारा
दोहा - जीभ संयमित राखिये, करिए ह्रदय से बातें |
गलत वाणी फ्रीक्वेंसी, तुडा सकतीं दातें || 5
एक ओर भूखमरी की विभीषिका
दूजा अणुशक्ति खर्चे का होड़
देशों के बीच कैसा कपट !
धमकी देता देने को फोड़
ब्रह्म , आग्नेय, पाशुपत अस्त्र क्या
नहीं थे पूरा पूर्वजों के पास ?
ह्रदय क्षेत्र उनका व्यापक था
बहुत था उनका आत्मविश्वास
सिद्धियाँ केवल कौतुहूल नहीं
कठिन मनुष्य का आत्मनियंत्रण
पूर्वजों की चेरी थीं सिद्धियाँ
आतीं बिना दिए निमंत्रण
विज्ञान से हो सकता बस
सीमित क्षेत्र में ही वर्षण
पूरा पूर्वजों के पास थी क्षमता
जिससे वृष्टि, वरुण आदि का आहवान
धन मात्र साधन था उनका
द्रवित होते देख जग हाहाकार
नहीं बताते की उनके पास
विलक्षण शक्तियों का था भण्डार
शक्तियों का प्रयोजन उचित दिशा में
ये मानव कल्याण के निमित्त
पूरा पूर्वजों को महसूस था
पर आज शक्तिवान कितने असंयमित !
जड़ की शक्ति बस सीमित ही है
उसे आवश्यक यूरेनियम की
तप शक्ति चेतन मयी है
आवश्यकता मानसिक सुनियोजन की
एकाग्रता ही एकमात्र कूंजी है
प्रकृति के रहस्यद्वार पर दस्तक देने की
समाधि आदि ही समझाती विधियां
अलौकिक चेतना जगत् में गोता कीअग्नि के पास तापनुभूति होती
ताप ही गुण है इसकी
ईश प्रदत राह पर चलें तो अति आनंद भान
पूर्ण आनंदमय परमात्म चेतन ही
दोहा - असंगत लगती ये सब, हम सब माया के अधीन |
आगे बढ़ें जैसे एक, जल चीरती मीन || 6बहुत गहराई से नहीं व्याख्या
एक उदाहरण ले हम जान
वह वैज्ञानिक और आध्यात्मिक
वह है आइनस्तीन महान
सापेक्षवाद के सिद्धांत ( theory of relativity) में
होता मायावाद का दर्शन
रेलगाडी में बैठे व्यक्ति को
चलते दीखते स्थिर भवन
जलती तवा पर हाथ रखें तो
एक क्षण लगती काल विकराल
यदि किसी को लग जाए समाधि
तो कईयों दिन कुछ क्षण समान
सभी वस्तुएं मायायुक्त हैं
सबकी स्थिति है सापेक्ष ( relative )
वस्तुतः है कुछ और भासता दूजा
बस परमसत्ता ही है निरपेक्ष ( absolute )
पत्नी करती पति से प्रेम पर
जब आता दाम्पत्य जीवन में मोड़
नरक उत्पन्न करते गृह- क्लेश
जाता मन संपत्ति की ओर
कहाँ वह सुहावना शैशव काल
सरल ह्रदय और सुकुमार गात !
जगत बड़ा निष्ठुर आता समझ
जब व्यस्क लगाता माँ को लात
माता वही बालक उसका ही
तब क्यों अब मानस में परिवर्तन
फोर डायमेंशनल स्पेस को मानें
और समझें सापेक्षवाद ( theory of relativity) का दर्शन
वास्तविक कुछ और भासती कुछ और
शाबास धन्य है उनकी मजाल
जो निकलने की कोशिश करते कूप से
यह है माया का जंजाल
आइनस्तीन से पूछा गया की कौन वह ओरिजिन
जिसका नहीं ले रहे नाम
चुप्पी खोली और बताया उसने
अब आगे आध्यात्मिकता का काम !!
उसके कब्र पर लिखवाया
वही सत्ता चेतनायुक्त, सर्वव्यापी इर्ष्याहीन
वही वह निरपेक्ष ( absolute ) ओरिजिन
अनुभूति जन्य पर व्याख्याहीन
दोहा - विज्ञान और अध्यात्म, के मध्य एक कड़ी |
जड़ से चेतन की ओर, विज्ञान अब चल पड़ी || 7
अब फिर विज्ञान पूछा कि
ये क्या है तुम्हारी मूर्ति पूजन
क्यों निर्जीव मूर्ति से प्रार्थना करते
जैसे कोई हो यह स्वजन
जड़ मूर्ति तो है निजीव
और न ही है इसमें अकल
न समझे न बोले फिर भी
तुम पर सवार क्यों बेअकल
सारे विधर्मी लोग भी देख
इससे तो कतराते हैं
इसे पूजना तो बहुत दूर
नग्नता मान , हंसते हैं इतराते हैं
यदि कार्य एक और कारण एक
समय भी समान और न साधन भिन्न
तब क्यों कोई सफल कोई असफल ?
कारण एक सत्य अविच्छिन्न
इसमें भावना का ही प्रभाव है
सफल वही जिसे भावना है लगती
इसी कारण अपने प्रचलन में है
बड़ी विधि विधान बुतपरस्ती की
दृश्य लोकों से कई भिन्न लोक हैं
भावनाओं की बड़ी है शक्ति
यह वैज्ञानिक भी बताते की
कई खोजें हो चुकीं अप्रत्याशित
ये सब मूर्तियाँ व्यर्थ नहीं
भाव , ध्यान साधने के यन्त्र हैं
ये पूजन हैं नहीं बल्कि
आत्मोन्नति के उचित तंत्र हैं
दोहा - मन है जैसे चिडिया, विचित्र इसकी उड़ान |
मूर्ति इसका पिंजडा , लग जाती है ध्यान || 8
गीता में भगवान कहे कि
कालों में वह महाकाल
आज काल नहीं महाकाल है
ख़त्म होनी दूष्प्रवितियों का जंजाल
ब्रह्मलोक का एक क्षण है
धरती के कई वर्ष समान
देखा जाय कि कैसे धर्मज्ञ
आश्चर्यचकित हैं इसको जान
समय तो बस एक वस्तु है
कर्म गति मापन का स्केल
दशानन बाँधा था पाटी में
उसके लिए यह था खेल
किसी को कर्म खेल जैसे सहज
उसको पड़ती समय कि किल्लत
दो घंटे जैसे ही बीतें दिन में !
काम अपूर्ण और डर होने की जिल्लत
अनुद्योगी कहता, बाप रे !
कितना बोरियत, कितना बड़ा दिन !
कैसे बीते दिन का सफ़र
दिन काटना हो जाता मुश्किल
वस्तुतः समय की अनुभूतियाँ भिन्न भिन्न हैं
ये हैं कर्म गति पर निर्भर
उद्योगी के लिए सूर्या ढला जल्द से
अनुद्योगी के लिए देर तक ऊपर
यदि कर्म गति कर दी जाय
जितना है प्रकाश की चाल
समय सिकुड़ कर इतना छोटा
जैसा शून्य है इसका मान
परमब्रह्म काल से बंधा नहीं
इसीलिये है वह कालातीत
कर्मगति उसकी अनंत रफ़्तार से
अतः ब्रह्माण्ड के हर कण में प्रतीत !!
रामकृष्ण कहा करते थे रे नरेन् !
कह लोग उठाएं निज किश्ती के पाल
बहुत ही विशिष्ट है यह समय
बहुत उर्जा बस साधना के कुछ काल
हम लोगों का अवसर अचूकनीय है
बड़े हैं हम लोगों का भाग
सब चूकें पर अवसर न चूकें
रिद्धियाँ सिद्धियाँ कुछ समय में जाग
सूक्ष्म जगत में हो रहे अब
परिवर्तन बहुत ही जल्दी हैं
समय रहते चेतना आज की
सबसे बड़ी अक्लमंदी है
दोहा - हैं अनुदानें बरस रहीं, नहीं इसे तुम खोना |
बैंक बलेंस करें हम , नहीं तो कल रोना || 9अनुदानें होती हैं क्या ?
कैसे हैं ये पायी जातीं
क्या कारण कि अध्यात्म में
अंतर्ध्यान कि कल्पना है आती
पूरा पूर्वजों क्या सुरा सेवन करते थे
सोमरस क्या होती है चीज
हिप्नोटिजम , मेरेस्मिज़म क्या
क्या पुरुषार्थ है उसे अजीज ?
शाप, वशीकरण , उच्चाटन क्या ?
क्या होती साधनाएं तंत्र
क्यों महत्व नवरात्रियों की
और अध्यात्निक यन्त्र जैसे श्री यन्त्र
क्यों महत्व बड़ी अध्यात्म में
भगवा और बासंती रंग
रंग बिरंगे कई वस्त्रों को देख
होती मन की गति भंग ?
आत्मा मूलतः है स्वच्छ पर
जब होती है यह शरीरबद्ध
सफ़र करती चौरासी लाख योनियों के
जमती इसपर राहों की गर्द
कुसंस्कारों के गर्द लिए ये
साथ ही चलती फिरतीं हैं
कुछ गर्द कर्म ठोकर द्वारा झरतीं
कुछ नें फिर इसपर जमतीं हैं
मनुज शरीर मन आत्म संचालित
गर्द पड़ीं हैं इसके ऊपर
गर्द के दो स्वरुप हैं
कुछ है स्वर्ण कण और कुछ कीचड
दोनों ही बांधतीं हैं आत्मा को
करतीं दोनों ही आत्मा को भारी
योग साधनाएं हैं प्रक्रियाएं आत्मधुलाई की
अब है आती अनुदान की बारी
सतगुरु की आत्मा धवल श्वेत
तभी उसमें परमात्म का गुण
देख सकता हममें कितना कीचड और स्वर्ण
नेत्रों पर न उसके माया आवरण
आत्मा की धुलाई होती ताप से
ताप चाहिए, नहीं चाहिए आब !
एकत्रित करनी पड़ती तपशक्ति
ऋषि ट्रांसफर करने में कामयाब
गुरु भी तप का भण्डार
अलौकिक शक्तियों का यह एजेंट
पात्रता देखे और परख ले
तब वह होता है एग्रीमेंट
हर समय यह सुविधा नहीं
नहीं बाद में यह अमूल्य अनुदान
चुक जाता है स्वतः कर्ज
पा लेता है भक्त लक्ष्य महान
दोहा - आ रही है जोरों से, महाकाल की गुहार |
भागो मत वीरों रुको, ह्रदय से लो निहार || 10
इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिअशन की है
शून्य से अनंत स्केल
दृश्य प्रकाश की लब्ध सीमा अल्प
शेष फ्रीक्वेंस में नेत्र फेल
पराबैगनी और अवरक्त के बीच
दीख रही संसार का खेल
इनके बीच मात्र साढ़े तीन सौ का अंतर
तो शेष में हमारी नेत्रें फेल
जब पंखों का रेग्युलेटर वन पर
पत्तियां इसकी है अलग अलग दृश्य
जब ये लगतीं पांच पर
लगता है पंखा अदृश्य
सीमितता से बंधी हैं आँखें
दिखता मानव पर प्रकृति को भारी
सिद्ध ऋषियां तो प्रकृति माया मुक्त हैं
माया जकड़ी है दुनिया को सारी
सुरा सोमरस एक नहीं है
अंतर है जैसे आकाश और पाताल
एक विष तो दूजा अमृत
इसका नहीं आज भी अभाव
एक तो है विवेक मारती
ढा देती जीवन में कहर
दूसरी प्रज्ञानेत्र खोलती
दूर कर देती जीवन जहर
जब साधकों को मिलतीं आत्मझलकें
या अनुदानों की अमृतवर्षायें
मदमस्त हो पान करता साधक
आत्मआनंद में ह्रदय हर्षायेमनुज देवताओं को ही यह सुलभ
नहीं है सुलभ दानवों को
कुपात्र हाथ से होता लुप्त
प्राप्त बस उत्कृष्ट मानवों को
हिप्नोटिजम , मेरेस्मिज़म और वशीकरण
भी हैं पूर्णतः विज्ञान सिद्ध
नहीं इनमें आश्चर्य कि ये सब
हो चुकें हैं जगत प्रसिद्द
पहुंचे साधक में कुछ चमत्कार
और उपस्थित कुछ विशेष पावर
परमात्म पुत्र में सब संभावनाएं
उत्पन्न होतीं कई गुणों की धार
ये धार कल्पना नहीं हैं
सुपर पावर के हैं सब अधीन
ये बस कुछ विशेष तरंगें हैं
जिन्हें नहीं पकड़ सकता मशीन
परमात्मा तो गुणातीत है वो
सर्वशक्तिमान और सार्वजनीन
धार प्रभावित करतीं हैं मनुज को
जिसकी है व्याख्या आसान नहीं
तरंगों के गुणधर्म अनंत हैं
और अनंत हैं उनके क्रियाकलाप
इससे हम समझ सकते हैं
हिप्नोटिजम , मेरेस्मिज़म, वशीकरण और शाप
इन फ्रीक्वेंसिज की नहीं पकड़
सामान्य मष्तिष्क की परिसीमन
आवश्यकता अध्यात्म भाव की
सुचिन्तन चरित्र अनुशीलन
कुछ रेडियो की ज्ञात फ्रीक्वेंसिज
पकडी जातीं उचित ट्यूनिंग पर
तब क्यों नहीं अनुदानें भी ?
उचित भागवत भाव में होकर
माया ही बाधक है परमात्म दर्शन में
चाहिए सुचिन्तन चरित्र वृति
त्याग भाव कुंजी माया की
अतः त्याग भाव है बड़ी अजीज
दोहा - है सतगुरु की महिमा बहुत, नहीं जात बखाने |
अभागे हैं अनजानें, जात कल सब माने || 11
शुभ अशुभ मिश्रित है ब्रह्माण्ड में
अनंत प्रकार की धारें
कुछ फ्रीक्वेंसी शरीर पोषण करतीं
कुछ देतीं हैं जीव को मारे
अध्यात्म एक ब्रह्माण्ड समान है
इसमें निहित अगम, निगम तंत्र आदि सारे
भौतिक, जीव, रसायन, वनस्पति
आदि विज्ञानं है केवल तारे
अध्यात्म के अर्न्तगत ही हम
सभी विद्याओं को हम मान
सब मिलकर जानी चाहती पूर्णता को
इसे लें हम जान
ब्रह्माण्ड अनंत है, फैलती हर क्षण
जाना चाहती किस सीमा में
अपने आकाशगंगा( मिल्की वे ) जैसे असंख्य विस्तृत
ब्रह्माण्ड में हैं मिल्की वे
इस अपने आकाशगंगा में ही अनेकों सूर्य
कई गुने बड़े अपने सविता से
इनकी गिनती ही इतनी बड़ी है
असंभव है बांधना कविता से
प्रत्येक सविताओं की तो हैं
सूर्यमंडल अपनी अपनी
ब्रह्माण्ड में असंख्य सूर्यमंडल
वर्णन नहीं कर सकती कोई कथनी
अपने सूर्य के नौ गृह हैं
बुद्ध, शुक्र, पृथ्वी , अरुण
मंगल आदि कई गुने बड़े ग्रह
बृहस्पति शनि और वरुण
ब्रह्माण्ड तो है विभु, आकाशगंगा में
पृथ्वी का है क्या आकार !
यदि आकाश गंगा पृथ्वी जैसी वृहद्
तो क्या पृथ्वी सरसों (mustard seed ) इतना भी बड़ा !
ब्रह्माण्ड में अनेकों जीव समृद्ध ग्रह नक्षत्र
ब्रह्मलोक नहीं है मिथ्या
क्या पुष्ट नहीं करतीं इस तथ्य को
धरती पर दिखतीं कुछ उड़न तश्तरियां
सम्बंधित ग्रहों का अनुदान स्रोत सूर्य
भरता जीवित ग्रहों में प्राण
अगणित प्रकार की फ्रीक्वेंसीज का
है यह अपना सविता भण्डार
मानव का हैसियत बस एक व्यष्टि
पर उसमें है विद्यमान जो है समष्टि में
जो गुण मनुष्य के अन्दर, दैवीय स्थान
वे विद्यमान हैं इस सृष्टि में
मानव की हैसीयत कितनी बड़ी
उसे मात्र कुछ की ही जरूरत
शतांश नहीं कोटि अंश ही धारण कर पाती
और लौटा देती है कुदरत
सूक्ष्मभाव मनोसंस्थान की
बड़ी सम्बन्ध दैवीय शक्तियों से
उचित भाव ट्यूनिंग को मोडें
जैसे गलत ट्यूनिंग पर नहीं रेडियो से
असंगत लग सकती हमें
क्योंकि हम हैं माया प्रकृति के अधीन
हम सीमितता छोड़ आगे बढ़ें
जैसे जल चीरती है मीन
मनुज जितना सकता है सोच
जितने सारे गुण अभिलाषा
समझ सकता मिल परब्रह्म
सर्वशक्तिमान उसकी परिभाषा
दोहा - सविता प्राण का भण्डार, जीवन का आधार |
गायत्री मंत्र जप से, आती उससे धार || 12
नवरात्रियाँ विज्ञान सिद्ध हैं
ज्योतिष ग्रहों के स्थिति पर निर्भर
किस कोण पर कौन ग्रह कैसी तरंग
जिससे प्रभावित होती सचराचर
ऐसी दिव्य फ्रीक्वेंसीज आतीं नवरात्रि में
जो भरी पड़ीं हैं दैवीय शक्ति
साधना भाव में सहायक होतीं
जैसे तूफ़ान की रूख अनुकूल किश्ती
भव सागर तरने की रफ्तार
जाती है कई गुनी बढ़ी
अनुकूल फ्रीक्वेंसी उचित भण्डारण
बीती मात्र कुछ ही घडी !!
जिस जीव में जो भी अल्प
चाहे वो भौतिक या अध्यात्मिक
सविता तो देव समान है समृद्ध
देना तो एक गुण है दैविक
आध्यात्मिक यन्त्र भी हैं इन
ऐनर्जिज के पकड़ने की उचित विधान
मिस्र के पिरामिड भी हैं
इसी विधि के कुछ उचित प्रमाण
किस आकार और डायमेंशन में होगी कितनी
दैवीय ऐनर्जिज के निवास
मात्र कौतुहूल ही नहीं मगर ये
सुनिश्चित तरंगे महाकाश !
वैज्ञानिक यंत्रों के निर्माण में
लम्बाई और चौडाई का महत्व
अध्यात्म क्षेत्र भी विशाल
इसके यंत्रों में भी वह तत्त्व
"वायब्ग्योर" की सात रंग का
भी सम्बन्ध वेब्लेंथों से
अंगूठी पहनें या वस्त्र पहने, आती धारें
उचित आकाशीय पिंडों से
कोई राजा कोई रंक कोई हँसता कोई रोता
अद्भूत है यह जगत प्रपंच
मात्र तीन घंटे का अभिनय यह
जब तक विद्यमान यह मंच
दोहा - माया जकड़ी दुनिया, अद्भूत है संसार |
वास्तविकता है क्या, करतें रहें विचार || 13
पीपल वृक्ष क्यों पूजनीय
नहीं समझ में आता
मृगछाला कुश चटाई क्यों
सतगुरु का चरणामृत पीता
सभी परम्पराएं ऐसे लग रहीं
जैसे हो प्रश्नचिन्ह लकीर
समझ में नहीं क्यों आदर देते
आता यदि कोई फकीर
प्रदूषण नहीं मालूम पड़तीं
इसपर हो गई उपेक्षित दृष्टि
मौसम कैसे खिसक रहे
वातावरम गर्म, अनियमित वृष्टि
प्राणवायु परिवर्तित होता धूम्र में
खपत बड़ी है इसकी वाइड
मोटर कारखाने करते परिवर्तित
आक्सीजन से कार्बन डाई आक्साइड
वृक्ष बन हैं काटे जा रहे
कौन करेगा यह क्षति पूर्ति
क्या सांस लेगें हम दम घूँटेगा
इसीलिए देवता हैं वृक्ष
ओजोन पर बनती ढाल कई
अमंगलकारी ऐनर्जिज के
अल्ट्रावायलेट आदि हानिकारक तरंगे
दौड़ती पृथ्वी की और सूर्य से
ओजोन परत के ओजोन कणों से
अल्ट्रावायलेट कर रही संयोग
नीचे आक्सीजन की डेन्सिटी कम है
अतः आती नीचे करने योग
ओजोन की ढाल खप रहीं हैं
नीचे की विभीषिका हरने में
पर इसके कारण है आ पड़ी
आफत बड़े पैमाने में
ओजोन परत में छिद्र हो गया
कौन रोके असुर अल्ट्रावायलेट का आगमन
घुस पड़ी संसार समाज में
प्रतीत होती स्थिति भयावन
अल्ट्रावायलेट के कारण क़यामत
नहीं व्याख्या करने की चीज
अब आया समझ में की क्यों
वृक्ष पूजती हैं अपनी संस्कृति
पीपल सर्वश्रेष्ठ प्राणवायु प्रवाहक
इसीलिये माना गया पूज्यनीय
देवता न मन जाता तो काटे जाते
स्थिति होती बड़ी दयनीय
धार निसृत होतीं शरीर से
तलवे कनिष्ठा आदि से विशेष
इसीलिये पैर छोना और चरणामृत पीना
गुरु हाथ पड़ता शिष्य के शीषध्यान अदि से उत्पन्न तरंगें
का हो परिपूर्ण शरीर में उपयोग
इसीलिए सुचालक छूना मन है
लौह आदि तत्वों का निषेद्ध संयोग
पाजिटिव निगेटिव विद्युत तारें मिलते
तो फाल्ट आदि की कर्कश आवाज़
मृगछाला आदि कुचालक और
कुश चटाई पर बैठने का रिवाज़
आज भी विज्ञान सिद्ध कर दिया
कि कुचालक साधन है सारे
जिनको पार नहीं कर सकतीं
शरीर विद्युत की धारें
दोहा - पीपल वृक्ष पूजनीय, प्राण वायु प्रवाहक |
पत्तों पर देवों के वास, तोड़ना है नाहक || 14
विज्ञान जा पहुंचा उपग्रहों तक
ठीक यह बात हम जाने
पर क्या धरती पर मनुष्य मनुष्य
के मानसिक भेद हम जानें ?
स्वास्थ्य दी अस्वस्थों को
पर भोग साधन भी दिया
पर न उचित दृष्टिकोण दी
बस श्रेय ही तूने लिया
अस्वस्थों पर किये सारे परीक्षण
क्या स्वस्थों के स्तर भेद जाने ?
जड़ों से नहीं ये , चेतन प्रयोग हैं !
उचित दृष्टिकोण आवश्यक, नहीं मनमाने
क्यों मानव तन धरता प्राणी
क्यों कोई संत तो कोई चोर
क्यों कोई हरदम सुख भोगे
और विपत्ति किसी के चारो ओर
क्यों कोई स्वस्थ शरीर पता
जन्मजात ही उपलब्ध सामग्री
क्यों कोई भूखे सोता, रोता
और घिसती पिटती कराहती जिंदगी
मानव जीवन एक अलभ्य अवसर
दो अवस्थाओं के बीच की कड़ी
और लक्ष्य सार्वकालिक है
वो है मोक्ष परम सुखदायिनी
मोक्ष है स्थिति मिलन का
चेतना का परम चेतना में
कुछ आत्माएं मिल चुकीं, और कुछ मिलेंगीं
आने वाले काल में
मौलिक रूप से आत्माओं में
है नहीं कोई अंतर
आत्मा विकार रहित व पूर्ण है
इसे हम समझेंगें तदनंतर
जब प्रक्षेपित किया जाता पाषाण खंड
शांत जल के सरोवरों पर
होतीं विचित्र हलचलें इसमें
आँखें ठहरतीं लहरों पर
ठीक यही स्थिति मानव मन की
शांत मन में बातें हैं विस्मृत
ह्रदय सरोवर से टकरातीं, उत्पन्न भाव लहरें
खोलतीं कुछ पूर्व स्मृति
देह भिन्न भिन्न , आत्म मूल एक
हर्ष विषाद काम क्रोध की विभिन्न परिस्थितियाँ
भिन्न भिन्न सरोवर पर जल एक ही
पाषाण प्रक्षेपण की विभिन्न स्थितियाँ
जिस सरोवर का जल जितना निर्मल
प्रसूत लहरें उतना ही निर्मल
आत्मा यदि स्वच्छ तो अधिक संवेदनशीलता
प्रज्ञा विवेक यदि नहीं तो मंदी
दोहा - आत्मा में अभेद, परमात्मा है एक |
भिन्न भिन्न संस्कार, बनाती मनुज अनेक || 15
जल तो एक ही है वह है आत्मा
"शीघ्रता" विशेषता है बुद्धि
प्रक्षेपण के कारण उत्पन्न लहरें
गुण प्रक्षेपणता है मन की स्थिति
मन करता तभी पत्थर फेंकें
है आत्मा इससे सर्वथा भिन्न
इस प्रकार हम देख सकते की
मन बुद्धि आत्म शरीर विभिन्न
कारण मिटती तो गोलीय तरंगें
छोटी होती जातीं क्रमोत्तर अनभिज्ञ
कितनी भी छोटी क्यों न हों पर अस्तित्व इनका
अनंत समय तक , ये विज्ञान सिद्ध
ये आवश्यकता पड़ने पर
उचित समय हैं जाती उभर
इसी प्रकार संस्कार भी सूक्ष्म रूप में
भ्रमण करतीं हैं जन्म जन्मान्तर
संस्कारों , कुसंकारों के समूह को
हम कहते हैं प्रारब्ध
जीव मात्र पर कितना प्रारब्ध
ये ज्ञान है गुरु को लब्ध
जाना जीव को परम मंजिल तक
ये प्रारब्ध उसे हैं जकडे
एक गुण स्वयं समंजक कि
वो सबसे सरल मार्ग पकडे
प्रारब्ध भोग क्रमागत जन्मों में नहीं
हो सकता कि सौवें जन्म बाद आये
कभी साधु बन , कभी चोर बन भोगता
वो पकड़ता है स्मालेस्ट वे
जब ये भोग मात्र हो जातें
एक निश्चित सीमा के अन्दर
बाँट जाते शुभ कर्म शुभ चिंतकों पर
चढ़ते दुष्कर्म अशुभ चिंतकों के सर पर
इसीलिये कहा गया कि यदि भोग करें हम
पर रखें हम त्यागी वृति
अनासक्ति हर वस्तु में रखें
न कोई शत्रु न कोई मित्र
दोहा - सतगुरु को जरूरतें पड़ीं, सेना सेनानियों की |
गायत्री तो माता सामान है, प्रज्ञापुत्रों की || 16
जिस जीव का जैसा नेचर
सम्बद्ध वस्तुएं वैसे ही गुण वाले
तंत्र साधना के लिए वनराज खाल अभीष्ट
दाम मार्गी को मृगछाले
जड़ की शक्ति है सीमित
चेतना की है शक्ति अपार
सम्बद्ध वस्तुएं वैसे हीं बनतीं
जैसा है मनुष्य का विचार
जैसा भावना वैसा परिवर्तन
इसका है सुनिश्चित विज्ञान
अतः सत साधक गुरु गृह को जाता
औघड़ जाता है श्मशान
जैसी भावना वैसी फ्रीक्वेंसी
वैसी तरंग है विद्यमान अनंत
वैसी वस्तुएं खीचतीं जातीं
चेतन है जड़ का रूप जीवंत
गौ घृत से सतोगुणी तरंग
अतः आतीं सतोगुणी धार
तामसिक चीजों पर ध्यान लगे
तो भारती जाती तामसिक विचार
सुपर टेक्नोलॉजी मानने लगा अब
जड़ नहीं , विद्युत ही मूल ईकाई है
अनाहत नाद ही वह मूल ईकाई
क्या इसमें और नहीं गहराई है ?
सृष्टि, ब्रह्माण्ड जड़ चेतन सबमें
ईथर की कल्पना आती है
क्या परिकल्पनाएं नहीं वेदों के
प्राण शक्ति प्रतिपादन से मेल खातीं हैंसभी एनर्जी मात्र एक ही हैं
ये प्राण के विभिन्न रूप हैं
ध्वनि, ताप , विद्युत अलग नहीं
अभिव्यक्तियों के कई स्वरुप हैं
वैसे ही जैसे बूँद
समुद्र से मिलकर होती एक रूप
आत्मा परमात्मा केवल माया का भ्रम
यदि टूटे तो हो मिलन अनूप
समुद्र के लहरों में न कोई अंतर
दीखतीं यद्यपि अनेक हैं
मिले आत्मा यदि विराट में
लेती रूप एक हैं
वेदों की रचना कैसे हुई
और इसका महान प्रयोजन
ऋषियों के ह्रदय तार झंकृत हो गए
सुनकर कुछ शुभ वादन
लगा की अदृश्य आवाज़
ब्रह्माण्ड से है आ रही
आज कल जैसा शोध नहीं तब
कुछ अलग ही तरीका रहीकारण, जिज्ञासा , परिकल्पना पर्यवेक्षण
से सम्बंधित हैं तथ्य
अनुभूति जन्य व तीव्र तप प्रदत
श्रुतियां ( वेद ) हैं सत्य
आजकल जैसे प्रयोगशाला नहीं
न थे आवश्यक कीमती यन्त्र
कोष, ग्रंथियां , नाडियाँ युक्त
शरीर है सुव्यवस्थित तंत्र
वास्तु के जड़ पक्ष का नहीं उतना महत्व
खोज था चेतन स्तर पर
चेतना पक्ष को परखने के लिए
नहीं आवश्यक था उतना जड़
चेतना का जड़ में रूपान्तर
पलक के ही झपकते
हवा में हाथ घुमाया कि होते उपस्थित
दिव्य रथें , धनु , वाण आयुधें
तथाकथित बुद्धिजीवी नकारते रहे
अपनी ऐतिहासिक व्याख्याएं
पर आज भीं मिल जाते सत्य प्रमाण
जैसे समुद्र में डूबी द्वारिकाएं
दोहा - चार प्रकार की वेद हैं, ज्ञान का महासागर |
आर्षग्रंथों का सूत्र, गुरु कर दिए उजागर || 17
किसी जीव के अंतर्वेदना जानने
को नहीं आवश्यक था जड़
उस सम्बद्ध अंग से प्राण कम्पन मिलाकर
सुन लेते थे उसके चेतन
ऋषि वनस्पतियों के फ्रीक्वेंसीज से
निज प्राण कम्पन्न मिलाते थे
और इनके गुणधर्म का भेद
स्वतः ही खोल लेते थे
वेदों की पर्यायवाची हैं श्रुतियां
सुनीं गयीं पर नहीं चर्म कर्ण से
ऋषि तप त्याग से युक्त
अन्तःकरण स्वच्छ धवलता जैसे
एक श्लोक कई कई अर्थ
ऐतिहासिक और आध्यात्मिक
शब्दों की गुंथन विशेष स्वर लहरियां
प्रभाव डालतीं जैसे औषधि
लोक प्रचलन बड़े महत्व के
इनमें वैज्ञानिकता का है समावेश
सविता अर्ध्य, जनेऊ स्नान
सब परिपूर्ण वैज्ञानिकता से
प्रातः व संध्या सविता से
कोमल प्राणदायी रश्मियाँ निसृत होतीं
जल चढाते हम खड़े होकर तब
रश्मियाँ जल कणों से जा टकरातीं
विसर्जित होती चारों ओर
कुछ व्युत्पन्न रश्मियाँ जातीं
कुछ किरणें शरीर व्याधियां हरतीं
कुछ नेत्रों को सहारा पहुंचातीं
जनेऊ में मनोवैज्ञानिक लाभ आदि
पवित्रता भावना का है समावेश
ठीक इसी प्रकार स्नान विधि भी है
युक्त वैज्ञानिकता से
गंगाजल पहले सर पर चढाते
तब डालते हैं उसमें पैर
इसमें भी वैज्ञानिकता है
श्रद्धा का भी तो है खैर
ताप का गुण है कि बहती
जब है तापान्तर रहती
ऊँचे ताप से निम्न ताप की ओर
यह तुंरत है जा पड़ती
अगर पहले पैर का ताप कम
मस्तिष्क होती अपेक्षाकृत गरम
किन्तु चाहिए मष्तिष्क ठंडा
अतः शीष पर चढाना धर्म करम
दोहा - कुछ लोक प्रचलन, हैं उचित सर्व काल |
मानें इसे हम ना खोएं, दूजा नहीं सवाल || 18
वेदों की भाषा है संस्कृत
संस्कृत क्यों सर्वश्रेष्ठ, एक सुनिश्चित कारण
देवभाषा भी इसे कहते हैं
करती है यह विशेषता धारण
देवनागरी लिपि की शब्दों के आकार
की लें एक खोखली धातु नली
फूंकें शंख के तरह किसी सिरे से
उत्पन्न स्वर जैसे उच्चारण बोली
भाषा के क्षेत्र में भाषावाद की
बहुत कटु गरल है
यह सिद्ध हो गया कि कंप्यूटर के लिए
यही भाषा सबसे सरल है
सबसे पुरातन सबसे मौलिक
सब भारतीय और यूरोपियन भाषाओँ की जननी
उचित उच्चारण उचित तरंगें
सब फलदायी सब कलिमल दहनी
बोला विज्ञान कि
ढोंग दिखाई देता समाज में
छापा माला चन्दन रोडी
कोई सर पे तो कोई कंठ में
पूरा शरीर है लपेटे अघोडी
माला का महत्व है भावनात्मक
तथा जप संख्या का उचित गणक
छापे , चन्दन रोडी ग्रंथियों पर
जो हैं अभीष्ठ भावों के उत्प्रेरक
मानव मस्तिष्क है गोल
गोल है पृथ्वी और ब्रह्माण्ड
जो समष्टि में वो सूक्ष्म रूप में व्यष्टि में
और भी कुछ हैं कर्म काण्ड
जिससे उन दैवीय उर्जाओं या
फ्रीक्वेंसीज को पकडा जाए
शिखा स्थान पर उर्जा संग्राहक ग्रंथियां
बाल से क्यों , यों समझा जाए
बालों में है बड़ी चुम्बकीय शक्ति
जब कंघी है इनसे रगड़ती
कागज़ के छोटे टुकड़े
उनसे जाकर हैं सताते
दैवीय उर्जाओं को दिव्या तरंग या देव कहें
या कहें अदृश्य उत्तम विचार
T V के एंटीना के तरह खींचती
दिव्या क्षमताएं या सुविचार
शंख फूंकने से होतीं उत्पन्न
ऐसीं दिव्य स्वर लहरियां
दिव्य उर्जायें आ टकरातीं
विषाणु मरते, दूर होतीं अनेक बीमारियां
ह्विं क्लीं उच्चारण से होती
उत्पन्न कुछ ऐसी तरंग विशेष
अन्यथा इन शब्दों का क्या अर्थ ?
उचित भावः ट्यूनिंग रह गयी शेष
प्राणायाम भी विशेष प्रक्रिया है
प्राण के उचित भण्डारण की
प्राणों का महासागर भरा पड़ा
ऐसे ही नहीं कुछ विधियां इसकीइडा पिंगला है दो नाडियाँ
सुषुम्ना नाडी है इनके बीच
एक पाजिटिव दूजा निगेटिव
प्राण जब लेतें हैं खींच
जैसे पोटेंसिअल डिफ़रेंस हो तो
दो तारों के बीच विद्युत धरा बहती
वैसे ही धरा कुण्डलिनी से टकराती
रिद्धि सिद्धि के भण्डार खोलती
जैसे जैसे ऊपर जाती है
करती है क्रमशः चक्रों को भेद
अंतिम अवस्था में ऐसा होता की
साधक का भगवान् से अभेद
सरोवर व्यष्टि, महासागर समष्टि
एक आत्म दूजा परमात्म
दीखने में स्वतंत्रकाय पर सूक्ष्मरूप में
अनुदानों का होता आदान प्रदान
आत्म बूँदें तपतीं, वाष्पीभूत होतीं
मेघों पर जा चढ़तीं
कुछ वायु में कुछ द्रवीभूत हो नीचे आतीं
कुछ सत्सागर में जा मिलतीं
फिर वही स्थिति हे गुरु
ढो रहें हम माया जाल
सावन भादों बनता जीवन सारा
चाहिए कुछ अमृत अनुदान
दोहा - कर्मकांड नहीं दिखावे, ये प्रमाणित मनोविज्ञान |
ज्ञान काण्ड का पूरक, ले इसे हम जान || 19
कहता विज्ञान की
क्या नहीं ढोंग कीर्तन कथा
तप तीर्थ और पूजन
कितने सारे व्रत त्यौहार
भरे पड़े इनसे सारे सीजन
दिवाली में क्यों व्यर्थ दिए जलते
छूटते पटाखे जैसे गोली
होलिका दहन में हो हल्ला
रंग गुलाल लिए आती है होली
कीर्तन कथा बहुत जरूरी है
ये सब हैं धार्मिक पढाई
जैसे अभ्यास में करना पड़ता
समझना, याद करना आदि रगडाई
आत्मविस्मृति है मनुज का स्वभाव
भूलना सिद्ध करता है मनोविज्ञान
भूलना, याद करना आदि का क्रम
आध्यात्मिक साधना है और महान
व्रत का आध्यात्मिक कारण तप अर्जन है
पाचन शक्ति बढ़ाना भौतिक
मनोबल बढ़ता, व्याधियां हटतीं
भाव इसमें है धार्मिक
जब वर्षा काल बीतता, सड़ती वस्तुएं
आते अनेकों प्रकार के विषाणु
गन्दगी का साम्राज्य होता
तब दिवाली सफाई में मरते हैं कितने विषाणु
जलते दिए यज्ञ स्वरुप हैं
यज्ञों की महिमा है अपार
यह भाव उल्लास की सत्य की जय हो
जाती हो आहुतियों पर सवार
भाव उल्लास भरे रहना दूजा पक्ष है
आवश्यक इसके लिए होली
अपने त्यौहार मौसम अनुकूल
कईयों लाभ देने वाली
रंग उल्लास वर्धक हैं
मोहक क्षमता है इनमें
रंग तरंगों की फ्रीक्वेंसी विभिन्न
दायरा दृश्य सीमा में
सुकोमल हरित पल्लवों में
होती है अजीब आकर्षण
कुछ रंगों से होती है कुछ के
मन में विशेष विकर्षण
हलकी गुलाबी और नील निलय रंग
को देखने से जी नहीं है थकता
केसरिया त्याग, श्वेत शान्ति और
पीत वर्ण है शुभ और वीरता का
महापुरुषों की औरा शुभ्र
त्यागियों के केसरिया ढंग
क्रोधी लाल, देशप्रेमी गुलाबी
दुष्टों की धारें नीलें रंग
होलिका दहन एक यज्ञ स्वरुप है
भावः इसमें असुरता दमन
महायज्ञ अपने आप होता
प्रभावित करती सब जन के जीवन
दोहा - मनुज मनाये त्यौहार, भरे जीव में भाव |
पर्वों की वैज्ञानिकता, दूर करे दुर्भाव || 20
प्रकृति में जन्मदात्री जैसी मातृ शक्ति
उससे भी अति संवेदनशील
कालातीत ये सब शक्तियां
सभी धर्मों के लिए सार्वजनीन
ये भी तो एक तरंग है
कैसे पकड़ में आये ये
आवश्यक भाव ट्यूनिंग ही देती
गायत्री जप की उचित वे
कितना आश्चर्य दर्शन भी होता
उस मातृवत सत्ता का
वह व्यष्टि में और समष्टि में
हर जगह उपस्थिति उसका
सुपात्र साधक को जैसे समाधि में
होतीं कई दृश्य अनुभूतियाँ
जैसे सपने में हम कुछ देखें
याद रहतीं दृश्य अनुकृतियां
सिद्ध ऋषियों की चेतना समर्थ है
करने में सब अलौकिक कर्म
गुरुवार की चेतना सता है
विद्यमान गायत्री फ्रीक्वेंसी पर
अनुदानों का भी प्रावधान है
हमें चाहिए उचित वेब्लेंथ
विभीषिकाएँ समाप्त होनी हैं
परिपुष्ट होनी है सोशल हेल्थ
संतानें कितनी दूर भी क्यों न हों
माता को हरदम अवलोकित
ये ह्रदय तरंगों की समानता है
जान लेती पुत्र की स्थिति
अति आनंदमय अगम अगोचर
आसक्ति हीन अविराम
सरल सनातन स्नेही सत्ययुक्त
सुखदायी व सत्काम
कामना , कुटिलता , कुटेवों का
है केवल कपट जाल
दे दो दर्शन हे देव दूर करो
दस इन्द्रियों का यह मायाजाल
मद मोह मत्सर को न दें महत्व
मलिन मन देगा मार
भावना से भगवान् भासते
हैं कराते भवसागर पार
भ्राता, भगिनी सभी हैं नश्वर
नहीं शाश्वत भार्या भरतार
शाश्वत बस एक ही है
उसे सत्य कहें या कहें करतार
हे हरि हर लो हृदि तुच्छता
आया समझ अध्यात्म की विभुता
भोगवाद ढा दिया विपत्ति विभीषिका
आया समझ है इसकी लघुता
दोहा - गंगा और गायत्री, सुखदायी आधार |
गोमुख और सतगुरु से , सम्बंधित ये धार || 21
( Written by Sri Prakash [ sriprakash.rai@gmail.com ] for Gayatri Shaktipeeth, Harbanshpur Azamgarh , May- 1996)
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