युवा चेतना

कुंठा के दलदल में सोई, प्रसुप्त बीज जैसे कोई
अगणित संभावनाओं से युक्त, पर अकिंचन ! नहीं मुक्त
असमंजसता और श्रीविहीन, कुम्हलाहित और दिशाहीन
ग्रीष्म ऋतु में जैसे विकल, तपती धरा और वायुमंडल
चिंतन का बाधित तरण, अपसंस्कृति का अन्धानुकरण
लक्ष्य संकीर्ण है बना , साधन भी है गिना चुना
जैसे हवन कुंड के घृत आहुति से, जलना तो भी स्वहित में !
पाकर भी मन क्यों रुके ? भोगने से ज्वाला और भड़के
या पतवार विहीन हो कर , अमर्यादित नौका का विचरण
दिशा नहीं तो गति नहीं, दूरी दिशा पर निर्भर ही

पर अब निराशा की बात नहीं, दूरी जितनी भी सही
यदि दिशा समझ में आ जाए, गति अनवरत बनी रहे
तो लक्ष्यवेध सक्षम होगा, भटकाव नहीं, न भ्रम होगा
मानव में देवत्व भरण होगा, धरा पर स्वर्ग- अवतरण होगा
सज्जनता सुरक्षित हो जाएगा, असुरता दुम दबाकर भागेगा
दिया जगह जगह जल जाएगा, राह प्रकाशित हो जाएगा
असुरता अन्धकार सम्बंधी हैं, मानवता विरोधी हैं
दिया जलाने का पुरुषार्थ, युगानुकूल परहित परमार्थ
लोग दिशा पा जायेंगें, सत्पथ पर अग्रसर हो जायेंगें

यह यज्ञ युगानुकूल, आसुरी शक्तियों के प्रतिकूल
विचारक्रान्ति का लाल मशाल, असुरता का यह महा काल !
जब रण में उपस्थिति दिखाता है, दुष्टों के ह्रदय कंपाता है 
यह ज्ञान प्रकाश के तीरों से, अमानवीय जंजीरों के
बेडियों के काटता है बंधन , कर असुरता का मर्दन
भावनाओं को शुद्ध करे, ह्रदय गुहा के तम् हरे
पर यह काम आसान नहीं, यदि परम सत्ता का वरदान नहीं
सारथी स्वयं गुरुदेव हैं, मन स्वयं ही कुरुक्षेत्र है
अर्जुन हर प्रज्ञा परिजन है , साधना ही वह रण है
गांडीव यदि उपासना संयम है, तब लक्ष्य बेध सक्षम है
जो ज्ञान - अलोक के तीरों से, टकराते अशुभ विचारों से
तीरों से तीर कट जाते हैं, विचारों से विचार टकराते हैं
असुर विचार तब मरते हैं, देवत्व प्रकाशित करते हैं
हमें न रण का भय होगा, गायत्री का कवच होगा

वह युवक युवा नहीं, जिसकी चेतना पराधीन रही
वह संसार का भारभूत, और शैतानी पराभूत
अनर्थ में समय कटता है, एषणाओं में वह जलता है
नहीं रक्त में प्रबल उफान, नहीं भावनाओं का प्रतिदान
संकीर्ण दायरे में सीमित, भावनाएं कल्पनाएँ दूषित
जो केवल स्वयं के लिए जीता है, अपयश का विष पीता है
जो परहित में खप जाएगा, पीढियों से सफल कहायेगा
जीते ही मृतक कहायेगा, जो बस स्वयं में समय खपायेगा
यह दृष्टिकोण बन जानी है, यही सफलता निशानी है

सफलता इतनी आसान नहीं, जो तुच्छ साधनों पर निर्भर ही
क्षणिक आकर्षण में चकाचौंध, आज युवा मन में रही कौंध
सफलता का आज मापदंड, भी तो तुच्छ और उद्दंड
और अधीरता इसे पाने की, यही कहानी युवा मन की !
ये असुर विचार श्रृंखला बन कर, युवा मन को आकर्षित कर
इसमें गौरव का भान कराता है, अनैतिकता में उलझाता है
होने में गौरव लुप्त रही, दीखने में यह दीख रही
पर मुर्ख  यह न जानते ,कि इतिहास किसकी बखानते !
त्यागी ही महापुरुष कहलाते हैं, वे ही पूजे जाते हैं
दे तिलांजलि पुरानी परिपाटी को , स्थापना नयी विचारों को
सफलता को परिभाषित करना होगा, जन जन के मन में भरना होगा

युवा चेतना की अर्थहीन उडान, भौतिकता में खोजे समाधान
मृग का मरुस्थल में विचरण, और अनैतिक आचरण
पर क्या कोई संतुष्ट हुआ ? जब दौड़ दौड़ में समय चुका
कल्पनाएँ अठखेलियाँ करती हैं, मनोराज से मन भरती हैं
यह जंजीर बड़ी मोहक लगती, पर जब है ये जकड़ती
चेतना कराह उठती है, और वेदना उमड़ती है
पर संघर्ष का समय नहीं ? साधना नहीं, उपासना नहीं !
इस बेदर्द वेदना में प्रतिक्षण, और घायल लेटा समरांगन
मानव तिल तिल कर जलता है, पापकर्म जब फलता है
इस घायल स्थिति में भी, इस मुर्ख मन को फिर सूझी
कल्पना रंग दिखाती है, अपनाता पिछली परिपाटी है
सुख की आश दिखाती है, अविवेक का पोषण करती है
जब चक्र यह चल पड़ता है, युवा मन फिर गिर पड़ता है

यही तो है संसार चक्र, असुरता की है चाल वक्र
जब निर्वाधित विचरण करता है, मनमानी आचरण करता है
जन जन के मन में घुसता है, अनुसरण को उकसाता है
यही है शकुनी का छद्म चाल, यही है कंस विकराल
यही अमर्यादित वाद विवाद, यही निरंकुश बुद्धिवाद
जो भावनाओं से खाली है, अथवा अपरिष्कृत माली है
जो इस सुन्दर बगिया संसार, को उजाड़ रहा है बार बार
जब चेतना अधोगामी होती है, अधर्म प्रतिबिंबित होती है
पाती जब यह सही दिशा, बेधती तम् की काली निशा
तब गति यह पकड़ती है, कितनों को आलोकित करती है !
जो भी संपर्क में आता है, फूले नहीं समाता है
चेतना हर्षित होती है, जब सबको निज में समेटती है
तप्त हृदयों पर ठंडी बौछार, ज्येष्ठ ऋतु में शीतल बयार
घावों पर मलहम के जैसी, अपनत्व के सुखद स्पर्श सी
प्राणी जब विश्राम पाता है, तब निज से जुड़ पाता है
चेतना अंतर्मुखी होती है, सार्थक को समझाती है
साधना हल चलाती है, उपासना सिंचित करती है
अन्तःक्षेत्र उपजाऊँ बनती है, ऋद्धियाँ इसमें उगतीं हैं
बगिया विकसित होती है, सबको आकर्षक करती है
सुन्दर बाग़ सा अन्तःस्थल, यही है परिपूर्ण विश्रामस्थल
जो गुरुकृपा से मिलती है, यात्रा सुगम बनाती है
तब संतुलन बन पाता है, अनवरत उल्लास उमगाता है
जीवन यात्रा लगती सुखद, औरों के लिए भी प्रेरणाप्रद
अनेकों अनुकरण करते हैं, और दिए तब जलते हैं !


युवा चेतना ही वो गांडीव, जिसकी क्षमता है अतीव
यही है वो उपजाऊँ क्षेत्र, यही वह बगिया विशेष
यही वो शीतल बयार, अथवा ग्रीष्म ऋतु का तारनहार
संसार सुखमय बनाती है, रहने योग्य बनाती है
युवा चेतना ही वह मजबूत हाथ, जो अनेकों को लिए साथ
समुद्र पार कराती है, पतवार हाथ पकडाती है

युवा ह्रदय वो तप्त क्षेत्र, यह महाभारत का कुरुक्षेत्र
जो आज हुयी है दिशाहीन, और अनाचरण मर्यादाविहीन
जब अनर्थकता के ढ़ेरी जमाते हैं, तो खाई कहीं खुदाते हैं
असमानता और उंच नीच, दुर्भाव कुविचारों से सींच
और भी आगे बढती है, असुर मोर्चा बन पड़ती है
दिलों में दुर्भावनाएं पलती हैं, असुरता आगे बढती है
होती जब अधिकारों का अतिक्रमण, निर्बल अधिकारों का अपहरण
कुंठा यही बढाती है, निराशा भी फैलाती है
इस श्रृंखला की मजबूत जकड, मानवता हो जाती अकड़
शैतान प्रफुल्लित होता है, कुटिल अट्टहास करता है
यह अनुचितता का अर्चन है, यही अशिव का पूजन है
असुरता की यह सर्जना, विचारों की यह विडम्बना
कितनों के सपने चूर चूर, करके यह अमानवीय असुर
नग्न नर्तन कर रहा आज, जलती बधुओं से युक्त समाज !
कितने बच्चे अनाथ हुए, दुर्भाग्य दरिद्रता साथ लिए !
दर दर भटकने को बाधित, शिक्षा स्वास्थ्य से विलगित
इस कुचक्र में भटक रहे, यंत्रणा पीडा का भार सहे
फिर भी जीते जाते है, दर्दों को पीते जाते हैं
पराधीन चेतना का कातर स्वर, इस देह पिंड में जो नश्वर
रह रह पुकार लगाती है, और पुनः उकसाती है
पर ह्रदय कपाट जब बंद हुआ, मानव में देवत्व सोया
तब स्वर नहीं पहुंचती है , दस्तक दे लौट पड़ती है
अभाव में पड़ी असंख्य चेतनाएं, अशिक्षा आदि प्राकृतिक यंत्रणाओं
परस्पर उलझाती हैं, जब दूजे का कारण बनती हैं
अशिक्षा से बाधित उन्नति, अर्थाभाव बनाती अशिक्षित
कितने नहीं पढ़ पाते हैं, श्रृंखला में कसते जाते हैं
शिक्षा भोगों का साधन बना, तभी असुरता ने सीना तना
चंद लोगों के हित साधन में , निर्धनों के जीवन के
कितने ही क्षण भेंट चढ़ते, जीवन को घसीटते घसीटते
उन्नति का समय न पाते हैं, जीवन को जिन्दा रख पाते हैं
यदि हम समर्थ बनें, तो दूजे का भी हित चुनें
तो वही सफलता सफलता है, जिस पर सबका हित फलता है
ये विचार प्रसारित हो रही , दिया जो है जल रही
विचारों की अद्भूत शक्ति, ये स्वयं ही समर्थ प्रकृति
असुरता कितनी भी दिखे प्रबल, यह जड़ हीन ही और असम्बल
विचारों की शक्ति अनोखा है, अंधड़ को मोड़ते  देखा है
सुविचार हमें फैलाने हैं, दिए से दिए जलाने हैं

प्रज्ञापुत्र ही अर्जुन हैं, कुरुक्षेत्र ही अवचेतन मन है
गुरु विचारों की सेना है, जिससे निज को भर लेना है
हे गुरु ! हमें भी साथ लें, हम युगचेतना के वाहक बनें
हम लाल मशाल लें थाम, प्रहरी बन जैसे आठों याम
सुरक्षा का दायित्व अपनाते हैं, जागरूक बनते बनाते हैं
युग सैनिक जैसा अनुशासन, हम भी अपनाएं प्रतिक्षण
जिसमें असुरता की न दाल गले, हिम्मत पस्त हो चले
युवा चेतना का मान रखना है, बलिदानों से न चूकना है
हम स्वयं मशाल बनें, दिए सदृश स्वयं जलें
कर्तव्यों की घृत भरनी हैं, वर्तिका रूप में गूंथनी है
हम कच्चों धागों सा न बिखरें, न दिशा विहीन वर्ताव करें
सबके भाव बस एक बनें, और गुरु अनुशासन से सजने
पुरुषार्थ में सबको खपना है, परहित में सबको जलना है
 

राष्ट्र में नव चेतना भर आये, जन मन में प्रकाश छा जाए
दियों से प्रकाशित जग हो, और अंतःकरण जगमग हो
प्रतिदिन ही दिवाली हो, शक्ति सर्वहित रखने वाली हो
सबके उन्नति में उन्नति, यह भाव हो परिपोषित
बालक हो आज्ञापालक, बुजुर्ग ज्ञान के संचालक
स्त्रियाँ सेवाभावी हों, शील मर्यादा स्वभावी हों
युवा चरित्रवान बनें, भामाशाह धनवान बनें
चारो तरफ हरियाली हो, वातावरण आरोग्य कारी हो
सबका हित ले साथ चलें, आतंकवाद के न दाल गले
स्वर्ग धरा पर आ जाए, देव पुनः ललचायें
इस भूमि पर अवतरित होने को, कर्म योनि को जीने को
सशक्त समर्थ राष्ट्र बने, स्नेह सौभाग्य से सब सने
हर ग्राम एक तीर्थ बने, जीवन मधुमय संगीत बने
यह सतयुग में आने वाली है, और युग बड़ी निराली है
मन में कल्पना पलना है, दिए के सदृश जलना है


       

(Written by Sri Prakash [ sriprakash.rai@gmail.com ] May-2009)

                                                  

Comments :

gaurav mittal wrote...
best of the best

gaurav mittal wrote...
best of the best

Abhay Kumar wrote...
Bahut bahut dhanyvaad bahiya, bahut sundar kavita likhi hai aapne

Vineet/ vintrai@yahoo.com wrote...
Bahut sambhavana bandh di hai aapne dinkar ke baad

Vijay Kumar , vj_kumar20@hotmail.com wrote...
That was a very good poem. Please keep writing more and giving us to read it.

Sriprakash wrote...
Vineet Ji, Ye to apna Gaytri Mantra par
shraddha vishvaas hi hai jo likha
deti hai, anyatha apna kahan koi
kshamata hai


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