एक बार एक व्यक्ति ने अपना सर्वस्व
परोपकार में लगाकर संन्यास ग्रहण किया | वह सभी प्रकार से
ईश्वर में शरणागत हो गया | इसके कारण उसके योगक्षेम का भार
स्वयं उठाने के लिए भगवान् को सहर्ष बाध्य होना पड़ा | उसके
लिए देवदूत एक थाली में बड़े सुस्वादु भोजन लाता था और उसे
कराकर लौट जाता था | यह देखकर एक अन्य व्यक्ति भी अपना सब
कारोबार लड़कों को सौंपकर, गेरुआ वस्त्र पहनकर उसी के निकट
तप करने लगा |
अब देवदूत दो थाली लाने लगा, एक में सूखी रोटी तथा दूसरी
में वही सुस्वादु भोजन | दूसरे व्यक्ति ने लगातार सूखी रोटी
आते देखकर रहा- "मुझे ही क्यों यह सूखी रोटी मिल रही है |"
देवदूत ने उत्तर दिया- " भगवन ! यह फल तो संचित पुण्य के
अनुसार मिल रहा है | उसने पुण्य में सर्वस्य लगा दिया और
आपने जीवन भर में केवल एक बार बड़े अंहकार से एक व्यक्ति को
रोटी दी थी, उसी के ब्याज स्वरूप यह रोटियाँ मिल रहीं हैं |
अब आपकी सूखी रोटी रोटी भी समाप्त होने को है, फिर कुछ न
मिलेगा |"
अब इस व्यक्ति को चेतना हुई और उसने अपनी बाकी बची रोटी
देवदूत से मँगाकर दान कर दी और आप भूखा रहा | दूसरे दिन जब
देवदूत भोजन लेकर आया तो दोनों थाली सुस्वादु पकवानों से भरी
थीं | अखंड-ज्योति मई २००६, पेज
५७
तुर्की में जकीर नाम के एक फकीर हुए हैं |
वह आईन नदी के किनारे कुटी बनाकर रहते थे | एक दिन नदी में
एक सेब बहता आ रहा था | जकीर ने उसे पकड़ लिया |
अभी उसे खाने की तैयारी कर ही रहे थे की अंतःकरण से आवाज़
आई-"फकीर ! क्या यह तेरी संपति है, क्या तूने इसे परिश्रम
से पैदा किया है ? यदि नहीं तो इसे खाने का तुझे क्या
अधिकार ?"
सेब झोले में डालकर अब फकीर उसके स्वामी की खोज में नदी के
चढाव की ओर चल पड़े | थोडी दूर पर एक सेब का बाग़ मिला | कुछ
सेब के वृक्षों की डालें पानी को छू रही थीं, फकीर ने
विश्वास किया सेब यहीं से टूटा हुआ होगा |
उन्होंने बाग़ के स्वामी से कहा- " यह लीजिये आपका सेब नदी
में बहता जा रहा था |" उसने कहा "भाई मैं तो बाग़ का रखवाला
मात्र हूँ, इसकी स्वामिनी तो बुखारा की राजकुमारी है |"
फकीर वहाँ से बुखारा के लिए रवाना हुआ | कई दिन की पैदल
यात्रा के बाद वहाँ पहुँचा और सेब लेकर राजकुमारी के पास
उपस्थित हुआ |
फकीर को एक सेब लेकर इस तरह आने का हाल सुनकर राजकुमारी
हँसकर बोली - "अरे बाबा! इसको वहीं खा लेते , एक सेब यहाँ
लाने की क्या आवश्यकता थी?"
फकीर ने कहा-" राजकुमारी जी ! आपकी दृष्टि में एक सेब का
कुछ भी मूल्य नहीं, पर इस सेब ने तो मेरा सारा धर्म, संयम
और सारे जीवन की साधना नष्ट कर दी होती?" अखंड-ज्योति मई
२००६ , पेज ३३
दक्षिण भारत में एक छोटा-सा राज्य बल्लारी
नाम का था | एक बार महाराज शिवाजी की सेना ने उस पर आक्रमण
किया | बल्लारी के सैनिक जी-जान से लड़े, पर अल्प संख्या में
होने के कारण उनकी पराजय हुई | शेष सैनिक बंदी कर लिए गए
उनमें वहाँ की शासिका रानी मलबाई भी थी | शिवाजी ने उसको
सम्मानपूर्वक लाने की आज्ञा दी, पर मलबाई को बंदिनी दशा में
यह सम्मान बुरा लगा और उसने शिवाजी से कहा- "मैं तो इस
सम्मान के व्यवहार को अपमान की तरह समझती हूँ | आप मुझे एक
हारे हुए शत्रु के नाते मृत्युदंड दें |"
शिवाजी महाराज ने सिंहासन से उतरकर स्वयं उसका अभिवादन किया
और कहा - " आप जैसी वीर रमणियों का मैं अपमान नहीं कर सकता
| मेरी माता जीजाबाई का हाल में ही देहावसान हो गया है |
मैं उन्हीं की वीर प्रकृति का दर्शन आपमें कर रहा हूँ और अब
से मैं सदैव आपको माता के समान ही मानूँगा |" मलबाई के
नेत्र स्नेहवश भर आए, उसने कहा - "तुम वास्तव में क्षत्रपति
हो, तुमसे अवश्य ही धर्म और देश की रक्षा होगी |" अखंड-ज्योति मई २००६, पेज ७
बहुत दिन हुए, एक व्यापारी गुजरात में जाकर
व्यापार करने लगा | उसने अपने पुत्र अशोक को नालंदा
विश्वविद्यालय में पढने भेजा | कुछ दिनों में व्यापारी की
पत्नी की मृत्यु हो गई | उसके दुःख में उसने भी प्राण त्याग
दिए | मरने से पूर्व उसने अपनी सारी संपति अपने पुत्र अशोक
के नाम कर दी और उसके पास समाचार भेज दिया तथा तब तक
व्यवस्था एक न्यायधीश को सौंप दी |
समाचार प्राप्त होते ही अशोक व्याकुल होकर घर की ओर चला |
मार्ग में उसे एक अन्य बालक मिला तथा सहानभूति दिखाते हुए
उसने, उसके उत्तराधिकारी होने तथा परिवार में अकेला होने का
सारा भेद मालूम कर लिया और उसके साथ हो लिया | दोनों में
गाढी मित्रता हो गई, किंतु घर पहुँचते ही अशोक के साथ वह भी
रोने लगा, अपने को उत्तराधिकारी कहने लगा | न्यायधीश चकराया,
उसने व्यापारी के पुत्र को पहचानने की एक युक्ति निकाली |
उसने व्यापारी का एक चित्र मंगवाकर, उसकी छाती की ओर इशारा
करते हुए एक-एक तीर-कमान उनके हाथ में देकर निशाना लगाने को
कहा | यह भी कहा जो ठीक निशाना लगायेगा, वही उत्तराधिकारी
माना जायेगा | अशोक के साथी ने तो तीर ठीक निशाने पर छोड़
दिया, परन्तु अशोक उन्हें फेंककर फोटो से लिपट गया | उसे
देखकर उसके दिल में पिता के प्रति श्रद्धा-भाव जाग्रत हो गया
| अशोक ने न्यायधीश से संपति उसे ही दे देने को कहा तथा अपने
लिए पिता की निशानी माँगी | न्यायधीश ने समझकर कि असली
उत्तराधिकारी कौन है, उसे उत्तराधिकारी घोषित किया और साथी
को जेल भेज दिया | इस प्रकार के त्याग और श्रद्धा-भाव से उसे
सर्वस्व प्राप्ति हो गई | अखंड-ज्योति मई २००६ , पेज ११